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Sirjan | रचना संसार

 

खूंटे में मोर दाल है, का खाउं-का पीउं, का ले के परदेस जाउं...

आप इस लोक कथा को एक बार फिर पढं़े, अपने बचपन के दिन याद करें और नयी पीढ़ी को भी इसके माध्यम से समझाने की कोशिश करंे कि कैसे बड़ी से बड़ी चुनौतियांे का सामना हिम्मत और अक्ल से किया जाए तो रास्ते निकल आते हैं. और एक खास बात यह कि सब उसी की मदद करते हैं, जो अपनी मदद करना स्वयं जानता है-

भोजपुरी लोकगीत में जीवन के मर्म

लोकगीत की व्यापकता मानव के जन्म से लेकर मृत्यु तक है। ये सबकी संपति मानी जाती है। आज का बच्चा कल बड़ा होने पर वह अपने बच्चों को यह सुनता है। मृत्यु जीवन का कटु सत्य है, जिसे भोजपुरी मानस (और भी क्षेत्रों में थोड़ा बदलाव के साथ गाया जाता है) में बच्चों को खेल-खेल मंे सिखाया जाता है।

एहो देखीं जा

 

सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से
भोजपुरी में कई कवितायें, छंद, गीत रचे गये हैं जो लोगों के मानस मे वर्षों तक रचे-बसे रहे. आज भटकाव के दौर से गुजर रहे भोजपुरी गीत-संगीत की दुनिया से रू-ब-रू होनेवाली नयी पीढ़ी को उनके बारे में विशेष जानकारी नहीं. कई गीत ऐसे हैं, जो पांडुलिपियों में ही कैद होकर रह गयें. कई के पांडुलिपि भी खत्म हो गयें. खैर! बटोहिया वैसे गीतों में तो नहीं लेकिन इस अमर गीत की तासिर से नयी पीढ़ी बहुत अवगत नहीं. सारण जिले के नयागांव में 30 अक्तूबर 1884 को जन्में बाबू रघुबीर नारायण ने ‘बटोहिया गीत की रचना 20वीं सदी के आरंभ में की थी. अभी बटोहिया गीत का शताब्दी वर्ष चल रहा है. कहा जाता है कि भारत से दक्षिण अफ्रीका , मॉरिशस, त्रिनिदाद आदि स्थानों पर गये भोजपुर पट्टी के मजदूरों के बीच यह गीत उस दौर में राष्ट्रगीत जैसा महत्व रखता था. इस गीत को काफी ख्याति मिली थी. प्रस्तुत है शताब्दी वर्ष के अवसर पर बाबू रघुबीर नारायण का अमर गीत ‘बटोहिया’

सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से
मोरा प्रान बसे हिमखोह रे बटोहिया.
एक द्वार घेरे रामा, हिम कोतवालवा से
तीन द्वारे सिंधु घहरावे रे बटोहिया.
जाहु-जाहु भैया रे बटोही हिंद देखी आऊं
जहवां कुहंकी कोइली गावे रे बटोहिया.
पवन सुगंध मंद अमर गगनवां से
कामिनी बिरह राग गावे रे बटोहिया.
बिपिन अगम धन, सघन बगन बीच
चम्पक कुसुम रंग देवे रे बटोहिया.
द्रुम बट पीपल, कदम्ब नीम आम वृक्ष
केतकी गुलाब फूल फूले रे बटोहिया.
तोता तूती बोले रामा, बोले भंेगरजवा से
पपिहा के पी-पी जिया साले रे बटोहिया.
सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से
मोरे प्रान बसे गंगाधार रे बटोहिया.
गंगा रे जमुनवां के झगमग पनियां से
सरजू झमकि लहरावे रे बटोहिया.
ब्रह्मपुत्र पंचनद घहरत निसि दिन
सोनभद्र मीठे स्वर गावे रे बटोहिया.
उपर अनेक नदी उमड़ी-घुमड़ी नाचे
जुगन के जदुआ जगावे रे बटोटिया.
आगरा-प्रयाग-काशी, दिल्ली कलकतवा से
मोरे प्रान बसे सरजू तीर रे बटोहिया.
जाऊ-जाऊ भैया रे बटोही हिंद देखी आऊ
जहां ऋषि चारो वेद गावे रे बटोहिया.
सीता के बिमल जस, राम जस, कृष्ण जस
मोरे बाप-दादा के कहानी रे बटोहिया.
ब्यास, बाल्मिक ऋषि गौतम कपिलदेव
सूतल अमर के जगावे रे बटोहिया.
रामानुज रामानंद न्यारी-प्यारी रूपकला
ब्रह्म सुख बन के भंवर रे बटोहिया.
नानक कबीर गौर संकर श्री रामकृष्ण
अलख के गतिया बतावे रे बटोहिया.
विद्यापति कबीदास सूर जयदेव कवि
तुलसी के सरल कहानी रे बटोहिया.
जाऊ-जाऊ भैया रे बटोही हिंद देखी आऊ
जहां सुख झूले धान खेत रे बटोहिया.
बुद्धदेव पृथु बिक्रमार्जुन शिवाजी के
फिरी-फिरी हिय सुध आवे रे बटोहिया.
अपर प्रदेस-देस सुभग सुघर बेस
मोरे हिंद जग के निचोड़ रे बटोहिया.
सुंदर सुभूमि भैया भारत के भूमि जेहि
जन रघुबीर सिर नावे रे बटोहिया.
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Posted on 06 Mar 2011 by Nirala

लोग मुझसे उम्मीद करते हैं, मैं भी बहक गयी तो..., posted on 06 Mar 2011 by Nirala

 

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