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भोजपुरी सिनेमा: भंवरजाल के 50 साल

निराला

यह चटखारे लेने के लिए चैपाल में बैठकर फटाफट गढ़ा गया किस्सा नहीं. भोजपुरी सिनेमा से जुड़ा एक प्रसंग हैं. कुछ वर्ष पहले की बात है. छपरा के रहनेवाले फर्निचर के कारोबारी शर्माजी को भोजपुरी से लगाव था. उन्हें मुंबई में रहनेवाले कुछ दलाल किस्म के बिहारियों ने समझाया कि भोजपुरी से सरोकार रखते हैं, तो कुछ पैसा लगाइये. फिल्म बनायेंगे तो पैसे से पैसा भी बनेगा. माटी की महक वाली फिल्म बनेगी तो आपके दिल को भी तसल्ली होगी. शर्माजी सात लाख रुपये लेकर मुंबई चले गये. एक म्यूजिकल स्टूडियो में छह गीत रिकाॅर्ड हुए. शर्माजी के पैसे खत्म हो गये. स्टूडियोवालों ने पूरा पेमेंट न किये जाने की वजह से म्यूजिक ट्रैक देने से मना कर दिया. शर्माजी गिड़गिड़ाते रहे मुंबई मंे भोजपुरी सिनेमा जगत से जुड़े अपने उनलोगों के पास, जो उन्हें मुंबई ले गये थे. कल तक उनके आगे-पीछे लगे रहते थे, लेकिन पैसा खत्म होते ही उन्हें पहचानने से भी इंकार करने लगे सब. वापस लौटने का किराया तक नहीं था. मुंबई मायानगरी का छल-प्रपंच और फरेब के बारे में काफी कुछ सुन रखने के बावजूद अपने भोजपुरी लोगों के बहकावे में वहां पहुंचे शर्माजी को आखिरकार किराये का 700 रुपया जब एक आदमी ने दिया तो वह सात लाख रुपये से भी ज्यादा कीमती लगा. वह छपरा लौटे, फिर पैसे लेकर रिकार्ड किये गये छह गीतों को स्टूडियो से छुड़ाकर वापस आ गये अपने छपरहिया दुनिया में.. एक विरासत की तरह संजोकर रखे गीतों के उस रिकार्ड को, जो उनके सपने का एक हिस्सा था. जिसमें उनका एक पसंदीदा गीत- कहंवा के पियर माटी, कहां के कुदाल हे ...भी खनकती आवाज में कैद हो चुका था. लेकिन इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद खांटी भोजपुरी परिवेश वाले शर्माजी को मुंबई में रह रहे भोजपुरी सिनेमा वालों ने एक नयी बीमारी दे दी. उनके पास जब कभी भोजपुरी फिल्मों की बात होती, वह चीढ़ से जाते. झल्लाने लगते. गुस्सा करने की एक नयी बीमारी-सी हो गयी उन्हें.
छपरा के शर्माजी कायह किस्सा फिल्म सेंसर बोर्ड से जुड़े रहे बैजनाथ तिवारी ने जिस रोज सुनाया, संयोग से उसी दिन मुंबई से फोन पर ‘देसवा’ के निर्देशक नितीन से भी बात हुई. उन्होंने भी एक प्रसंग सुनाया. हुआ यह कि नितीन अपनी फिल्म ‘देसवा’ बनाने से पहले अनुभव लेने के लिए एक भोजपुरी फिल्म की शूटिंग देखने पहुंचे. भोजपुरी के कथित तौर पर सबसे बड़े आर्टिस्ट शूटिंग में व्यस्त थे. नितीन बताते हैं कि उन्होंने सुपरस्टार के असिस्टेंट से पूछा- किस फिल्म की शूटिंग चल रही है? असिस्टेंट का जवाब मिलता है- आई डोंट नो. फिर कैमरामैन से पूछते हैं कि किस फिल्म की शूटिंग चल रही है भईया. कैमरामैन भी कंधा उचकाते हुए जवाब देता है- आई हैवन्ट एनी आइडिया... फिल्म की शूटिंग चल रही है लेकिन पता नहीं है कि कौन-सी फिल्म शूट की जा रही है. film छपरा के शर्माजी के किस्से के बाद नितीन से मुंबई लाइव सुनते समय भोजपुरी फिल्म के 50 साल के सफर का पहला प्रसंग किताबी अध्याय के रूप में सामने था. कैसे 50 साल पहले बिहार के एक व्यवसायी विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी डाॅ राजेंद्र प्रसाद के कहने पर भोजपुरी फिल्म बनाने का सपना लिये मुंबई पहुंचे. भोजपुरी फिल्म बनाने की जिद और जुनून के साथ कहानी-स्क्रिप्ट लेकर घूम रहे नाजिर हुसैन से उनकी मुलाकात मुंबई के प्रितम होटल के पास हुई. शाहाबादी ने कहानी सुनने के बाद तुरंत 15 हजार रुपये निकालकर दे दिये कि आज से ही काम शुरू हो जाए. डेढ़ लाख में फिल्म बनाने की बात तय हुई, पांच लाख रुपये में ‘ गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो’ के रूप में सामने आयी, 75 लाख की कमाई हुई. जबकि वह समय ऐसा था कि नाजिर हुसैन की भोजपुरी में फिल्म बनाने की बात को बचकाना जिद करार देते हुए बिमल राॅय जैसे निर्देशक और कई अन्य खांटी और खुर्राट फिल्मवाले हंसी-मजाक उड़ा दिया करते थे, नाजिर की जिद, शाहाबादी के धैर्य से फिल्म बन गयी. लेकिन यह 50 साल पहले के इतिहास का एक पन्ना है, वर्तमान में शर्माजी का किस्सा सामने है. 50 सालों में कई उतार-चढ़ाव झेलते-देखते हुए 500 से अधिक फिल्म बना चुके भोजपुरी फिल्मी संसार, हिंदी और बाॅलीवुड की नकल करते-करते फरेब, छल और प्रपंच में 100 साल के करीब पहुंचे हिंदी फिल्मी संसार को भी काफी पीछे छोड़ चुका है. यह फरेब सिर्फ पैसे की ठगी तक ही सीमित नहीं है बल्कि भावनाओ के साथ खिलवाड़ का खेल ज्यादा खतरनाक है. जैसा कि भोजपुरी भाषा से लगाव-जुड़ाव रखनेवाले हिंदी के वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडेय कहते हैं, भोजपुरी फिल्मों के नाम पर धोखाधड़ी हो रहा है. नितीन कुछ और आगे जाकर कहते हैं, संस्कृति और भावनाओं के इन नये खिलाड़ियों के अपराध को माफ नहीं किया जा सकता.
यह विडंबना ही है कि भोजपुरी सिनेमा जब 50वें साल में प्रवेश कर रहा है तो उस पर बात करते समय अधिकांश भोजपुरीभाषी बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी 80 के दशक वाले दौर तक को शुकून भरे नजरिये से देखते हैं लेकिन अब वाले दौर को हताशा-निराशा और हिकारत भरे नजरिये से देखते हैं. तब, यह आशंका फिर से बलवती हो चली है कि क्या फिर भोजपुरी सिनेमा एक बार अज्ञातवास में जायेगा, जैसा कि पहले भी हो चुका है.1967-77 तक चुप्पीकाल ही रहा. पेंग्विन बुक्स से हाल में ‘ सिनेमा भोजपुरी’ नाम से आयी किताब के लेखक अभिजीत घोष कहते हैं कि अब अज्ञातवास में जाने का खतरा नहीं है, क्योंकि इस दौर में भोजपुरी सिनेमा ने अपना जो दर्षक वर्ग तैयार किया है वह लोवर क्लास है, पलायन कर दूसरे शहरों में रहनेवाले मजदूर हैं. अब उनके पास भी पैसा आ रहा है,उनके दम पर ही इंडस्ट्री खड़ा रहेगा. अभिजीत जिस वर्ग को भोजपुरी सिनेमा का दर्शक वर्ग मान रहे हैं, वह तो ठीक है लेकिन एक प्रोडक्ट के तौर पर बगैर मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग से जुड़े कोई भी उत्पाद कितने दिनों तक बाजार में टिके रह सकता है, यह एक सवाल है.
मध्यवर्ग, निम्न मध्यवर्ग के कटने या गांव-जवार से भी परिवार संग भोजपुरी सिनेमा देखने का चलन धीरे-धीरे यदि खत्म होता गया है तो उसकी कई वजहें हैं. हे गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो फिल्म जब आयी थी तो बनारस में एक जुमला ही चल गया था- गंगा नहाइये, विश्वनाथ जी का दर्शन कीजिए, फिर गंगा मईया को देखिये, तब घर जाइये. उसके बाद बिदेसिया, लागे नाहीं छुटे रामा, हमार संसार, बलम परदेसिया, धरती मईया, दंगल, दुल्हा गंगा पार के, बिहारी बाबू, माई, गंगा किनारे मोरा गांव जैसी कई फिल्में आयीं, जिसे लोगों ने देखा, खूब देखा, डायमंड और सिल्वर जुबली तक मनायी ये फिल्में लेकिन उसके बाद भोजपुरी फिल्में अज्ञातवास में चली गयीं. पिछले दशक में भोजपुरी फिल्म ने फिर जब नयी पारी शुरू की तो ससुरा बड़ा पइसावाला, पंडित जी बताई ना बियाह कब होई जैसी फिल्मों ने इसे बूम दिया और फिर धड़ाधड़ फिल्म बनने की शुरुआत हुई. मनोज तिवारी, रविकिशन, दिनेशलाल यादव ‘ निरहुआ’, पवन सिंह जैसे कलाकारों को स्टारडम प्राप्त होने लगा तो रानी चटर्जी, पंांखी हेगड़े जैसी अभिनेत्रियों ने भी नाम कमाये. बाजार का दायरा बढ़ा, साल भर में 70-80 फिल्मों का निर्माण होने लगा जबकि हे गंगा मईया के 1962 में बन जाने के बाद 1966 तक सिर्फ 19 फिल्में ही रिलीज हो सकी थी. इस नये दौर में अब करीब 50 हजार लोग परोक्ष या प्रत्यक्ष तौर इस इंडस्ट्री से रोजी-रोजगार के लिए जुड़ गये हैं. अपने किस्म के बाजार और रोजगार का सृजन करना ही इस दौर की सबसे बड़ी सफलता रही है. जैसा कि प्रसिद्ध फिल्म निर्माता अभय सिन्हा कहते हैं, अब इसका दायरा इतना बढ़ गया है, साल भर में लगभग 100 करोड़ का कारोबार हो रहा है, यह पीछे मुड़कर नहीं देखनेवाला. लेकिन भोजपुरी से ताल्लुक नहीं रखनेवाले निर्माताओं द्वारा सिर्फ पैसे के लिए फिल्म बनाने के क्रम में इसमें जबरिया अश्लीलता को दिखाया जाता है, जिस वजह से भोजपुरी क्षेत्र से कोई अभिनेत्री इसमें काम करने नहीं आ रही, यह इंडस्ट्री के लिए आनेवाले दिनों में सबसे बड़ी चुनौती होगी. अभय सिन्हा की दूसरी चिंता वाजिब है कि भोजपुरी फिल्मों में काम करने के लिए भोजपुरीभाषी हीरो तो बहुत मिल रहे हैं लेकिन इस इलाके की लड़कियां तैयार नहीं हो रही लेकिन गैर भोजपुरी भाषी निर्माताओं के आने से स्वरूप बिगड़ रहा है, यह ज्यादा हजम नहीं होता. क्योंकि भोजपुरी फिल्मों में शुरू से ही बच्चूभाई शाह जैसे गैर भोजपुरी भाषी निर्माताओं ने बिदेसिया जैसे फिल्मों में निवेश कर इसे आगे बढ़ाने का काम किया है. और फिर 1967 के बाद 10 सालों के लिए जब भोजपुरी सिनेमा का अज्ञातवास काल चल रहा था तो फिर बच्चूभाई ने ही पहली भोजपुरी रंगीन सिनेमा ‘ दंगल’ बनाकर इस खामोशी को तोड़ मनोबल बढ़ाने का काम किया था.
भोजपुरी के इसी नये दौर ने स्पाईडरमैन को भी इस भाषा में डब करवाने का अवसर दिया, सिंगापुर, माॅरिशस आदि में शूटिंग होने लगे. महुआ जैसे भोजपुरी चैनल के आगमन ने इसे नया आयाम भी दिया. मनोज तिवारी और श्वेता तिवारी जैसे भोजपुरी कलाकारों के बिग बाॅस-4 में पहुंचने से नयी चर्चा शुरू हुई. अजय देवगन, भाग्यश्री, जूही चावला, प्रिया गिल आदि ने भी भोजपुरी फिल्मों में काम किया लेकिन इस सवाल का जवाब अनुत्तरित रहा कि अगर इसमें इतनी संभावनाएं हैं तो क्यों मनोज बाजपेयी जैसे खांटी भोजपुरीभाषी कलाकार या प्रकाश झा जैसे खांटी भोजपुरी भाषी निर्देशक इस आंधी में भी इससे परहेज करते रहे. क्यों दामुल में बिहार के गंवई मुहावरों को मुख्यधारा की फिल्मों में जगह दिलानेवाले शैवाल जैसे ठेठ बिहारी लेखक एक ही भोजपुरी फिल्म लिखने के बाद इससे तौबा करने लगे. क्यों इतने बड़े बाजार के बीच तीन करोड़ से अधिक भोजपुरीभाषी भारतीय लोगों के बीच इसकी पकड़ कमजोर होते गयी. पहचान की नयी रेखा विद्रूप चेहरे के रूप में सामने आता गया.
पिछले कुछ वर्षों से हमरा हउ चाहीं, हई चाहीं जैसे नाम से भोजपुरी फिल्मे बनीं. फिर भोजपुरिया डाॅन जैसी फिल्मों का निर्माण हुआ और अब धर्मक्षेत्र, कुरूक्षेत्र जैसे हिंदी फिल्मों के नाम से भोजपुरी फिल्मों का निर्माण धड़ाधड़ हो रहा है. भोजपुरी फिल्मों के मशहूर स्टार रहे कुणाल सिंह कहते हैं कि यही डर है कि जब भोजपुरी के लोगेों को अपनी चीजें ही फिल्मों में देखने को नहीं मिलेंगी तो वह कितने दिनों तक चलेगा. यह आशंका अब सच में भी बदलता जा रहा है. अंधाधुंध और धड़ाधड़ फिल्में बनाने में माहिर भोजपुरी फिल्मी जगत पर पिछले साल से ब्रेक लगी है. मनोज भावुक कहते हैं कि 2010 में 25 फिल्में ही पूरे भारत में रिलीज हो सकी. अभय सिन्हा कहते हैं कि अब एक करोड़ से लेकर डेढ़ करोड़ में एक फिल्म का निर्माण होने लगा है, तो कमी आयेगी ही. भोजपुरी कलाकार रवि किशन कहते हैं कि अब भोजपुरी ने एक बाजार बना लिया है तो अच्छी फिल्मों का निर्माण भी शुरू होगा.
भोजपुरी फिल्मों के साथ सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि इतनी सारी प्रतिभाओं के बावजूद बिहार या उत्तरप्रदेश के गंभीर सृजनकर्मियों को इसने अपनी ओर आकर्षित नहीं किया या वह वर्ग इससे कभी आकर्षित नहीं हुआ. शैवाल कहते हैं कि 50 वर्षों के पड़ाव में यह सोचने की जरूरत है कि समस्याओं और चुनौतियों वाली भोजपुरी पट्टी से क्यों नहीं कोई अदूरगोपाल कृष्णन, सत्यजीत रे, गिरिश कर्नाड की तरह निकला, जबकि भोजपुरी का दायर ामलयालम, कन्नड़ या बांग्ला से बहुत बड़ा है और भाषा में मिठास, संस्कृति में विविधता भी कोई कम नहीं! शैवाल का सवाल अपनी जगह सही है लेकिन बीच में सिद्धार्थ सिन्हा नामक नौजवान ने जब ‘उधेड़बुन’ जैसी फिल्म बनायी तो उसे भी क्या बिहार या उत्तरप्रदेश के भोजपुरी समाज के लोगों ने गंभीरता से नोटिस लिया क्या, यह गौर किये जाने की जरूरत है. दरअसल भोजपुरी समाज ने अब भोजपुरी फिल्मों को अपने हाल पर छोड़ दिया है. रविकिशन की भाषा में कहें तो यह लावारिश इंडस्ट्री है, इसलिए संभलने में वक्त लगेगा. सिर्फ समाज ने ही नहीं, राजनीति ने कभी इसकी ओर ध्यान नहीं दिया. कभी राजेंद्र बाबू, जगजीवन राम जैसे नेता भोजपुरी भाषा में फिल्म बनने पर इसके राजनीतिक निहितार्थ भी देख रहे थे लेकिन बाद के राजनेताओं ने इसे लावारिश ही रहने दिया. नतीजा यह है कि स्टूडियो वगैरह बनने की बात तो दूर, भोजपुरी सिनेमा निर्माण के 50वें वर्ष के सफर तक राजकीय सम्मान स्वरूप एक कागज का टुकड़ा भी नहीं दिया जाता. संस्कृतिकर्मी अश्विनी कहते हैं, राजनीति क्येां विद्रुपता से आत्मीयता दिखाकर अपना कबाड़ा करवाना चाहेगी!

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