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दिल दिया, जान दी और दे दी सारी कमाई...

निराला

पहलेे आरा फोन मिलाया. फिर पटना, रांची और अंत में दिल्ली. कुछ भोजपुरी विशेषज्ञों से भी संपर्क किया. कुंवर सिंह के नाम से फाउंडेशन चलानेवाइे विशेषज्ञों से भी तसदीक करनी चाही. सबसे एक ही सवाल था- ये धरमन बीबी कौन थी? बाबू कुंवर सिंह से:क्या रिश्ता था?
कुछेक कुटिल मुस्कान के साथ तो कुछ अनमने ढंग से जवाब देते हैं. जवाब का लब्बोलुवाब होता है- अरे कुंवर सिंह की संघतिया (मित्र) थी धरमन, और कोई खास बात नहीं. थोड़ा बहुत सहयोग की थी 1857 की लड़ाई में...
थोड़े संभ्रंात भाषा बोलने वालों ने बताया- आत्मीय संबंध थे दोनों में. बाबू कुंवर सिंह का विशेष अनुराग था धरमन के प्रति.
भोजपुर के इलाके में कई संभ्रांतों से पूछ लीजिए धरमन के बारे में ज्यादा मुंह नहीं खोलना चाहते. अगर कुछ बतायेंगे भी तो इस एक सच को बताने के पहले कई बार पत्रकारिता के आॅफ द रिकॉर्ड जैसे शब्दावली को याद दिलायेंगे. कुछ इस तरह के लहजे में- इ बता रहे हैं सिर्फ आपकी जानकारी के लिए, छापने के लिए नहीं और छापिएगा भी तो हमरा नाम नहीं आना चाहिए...
लेकिन भोजपुर का गंवई इलाका, लोकमानस डंके की चोट पर एलान करता है कि धरमन अपने जमाने की मशहूर नचनिया ( तवायफ) थी. उनसे बाबू कुंवर सिंह बेपनाह मोहब्बत करते थे. जब जरूरत पड़ी तो धरमन ने जिंदगी भर की अपनी सारी कमाई बाबू कुंवर सिंह को लड़ाई लड़ने के लिए दे दी थी. सिर्फ कमाई ही नहीं दी बल्कि जीवन संगिनी के तौर पर कुंवर सिंह को नैतिक सहारा भी दिया. और इतने के बाद में जब बारी आयी तो अपनी जान भी गंवा दी.
लेकिन लोकमानस में गहराई से रचा-बसा यह सच किताबी इतिहास के अध्याय में दर्ज नहीं हो सका. 1857 के गदर पर, बाबू कुंवर सिंह पर, अनाम-गुमनाम नायकों पर, राष्ट्र प्रेमी तवायफों पर न जाने कितनी किताबंे आयीं, अनुसंधान भी हुए. बाबू कुंवर सिंह पर तो फाग गीत से लेकर कई-कई लोकगीत ही रचे गये हैं. उनसे जुड़े हुए लोक आख्यान हैं, किवंदंतियां हैं. लेकिन धरमन शायद ही कहीं दिखती हो! ऐसा क्यों, यह एक यक्ष प्रश्न है.
आरा और भोजपुर के इलाके में धरमन का नाम हर कोई जानता है. आरा में उनके नाम पर तो धरमन चैक ही है और वहीं पर धरमन का मकबरा भी. अब रहस्य से परदा सार्वजनिक तौर पर उठा है. भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा 1857 के अमर सेनानी सीरिज में प्रकाशित पुस्तक वीर कुंवर सिंह में दर्ज किया जा सका है कि धरमन कुंवर सिंह की दूसरी पत्नी थीं. वह मुसलमान थीं जिन्हें लोग नन्हीं के नाम से जानते थे. उन्होंने अपनी सारी संपत्ति 1857 के संघर्ष मंे कुंवर सिंह को दे दी थी. यह पुस्तक रश्मि चैधरी ने अनुसंधान के बाद लिखा है. पुस्तक में कुंवर सिंह के प्रमुख सहयोगियों की जो सूची प्रकाशित की गयी है, उसमें धरमन का नाम प्रमुखता से दर्ज है. उसी किताब में कुंवर सिंह का जो जीवनवृत्त दिया गया है, उसमें भी यह स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है कि उन्होंने दो शादियां की. पहली पत्नी राजपूत परिवार की थी और दूसरी पत्नी नन्हीं थी, जो धरमन के नाम से मशहूर थीं. नन्हीं से कुंवर सिंह की दो संतानें हुईं-विंदेश्वरी प्रसाद सिंह और महावीर प्रसाद सिंह.
लोकमानस में रचे-बसे कथा के अनुसार एक बार जब कुंवर सिंह को अंग्रेजों ने सार्वजनिक रूप से आयोजित मुजरे के कार्यक्रम में खिल्ली उड़ाने की कोशिश की, तभी से धरमन का स्नेह कुंवर सिंह से बढ़ा. कुंवर सिंह को प्रेम हुआ, बाद में वह सहयोगी और जीवनसंगिनी बनीं. अखिइ विश्व भोजपुरी विकास मंच के प्रमुख और भोजपुरी जमात में भाईजी भोजपुरिया के नाम से जाने जानेवाले बीएन तिवारी इस बात की पुष्टि करते हुए कहते हैं- मुजरे वाला वाकया पटना के बांकीपुर क्लब का है.
पता नहीं यह वाकया वहीं का है या नहीं लेकिन यह समझ से परे है कि धरमन के नाम से यह दुराव-बचाव-अलगाव क्यों? इस दुराव-अलगाव और बचाव ने एक महान प्रेम कथा को निगल रखा है. बीएन तिवारी कहते हैं कि यह कोरा भ्रम कुछ लोगों के मन में बैठ गया है कि धरमन का नाम यदि कुंवर सिंह से इस तरह जुड़ जायेगा तो सारा गुड़-गोबर हो जायेगा?
इतिहास के संग्रह में गहरी रुचि रखनेवाइे संग्रहकर्ता कर्नल सुरेंद्र सिंह बख्शी कहते हैं- हमें नायकों को नायक की तरह ही देखने की जरूरत है. इंसान है तो वह प्रेम करेगा ही. हमारे देश में तो इतिहास भरा हुआ है जब बड़े से बड़े नायकों ने प्रेम के इिए कई-कई त्याग किये हैं. हम जब कुंवर सिंह की बात करते हैं तो यह क्यों भूल जाते हैं कि भारत में महान प्रतापी सिख राजा रंजीत सिंह भी हुए थे. रंजीत सिंह ने मोरां नामक तवायफ को पाने के लिए, ब्याह करने के लिए अपनी पूरी शान और अहं को ताक पर रख दिया था. बाद में तनखिया की सजा भी काट लिये थे. तो क्या हुआ. क्या महाराजा रंजीत सिंह को इतिहास ने इसलिए खारिज कर दिया कि वे मोरां से प्रेम कर बैठे, मोरां से शादी कर लिये...!

बिदेसिया के निहोरा बा

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