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पिरितिया के अदभुत खेल

निराला
स्कूली जीवन में जब अपनी काॅपी के पहले पन्ने में लव इज ब्लाइंड और लव इज गाॅड को पूरी कलाकारी से लिख कर ही प्रेम की सारी कलाबाजियां दिखाया करता था, तब एक मास्साब गुस्साकर कहा करते थे कि मडई दुबे बनेगा का रे! मैं नहीं जानता था कि मडई दुबे कौन हैं, न उस समय जानने की इच्छा थी. लगता था मास्साब गुस्साकर किसी गुंडे-मवाली से मेरी तुलना करते होंगे, इतनी हिम्मत भी नहीं थी कि उनसे पूछता कि किससे तुलना करते हैं मेरी ओर कौन हैं मडइ्र्र दुंबे जो ‘लव’ षब्द देखते ही आपको याद आने लगते हैं. एक बार उत्सुकता से पूछ ही लिया मास्साब से. जरा बताइये कि इ मडई दुबे कौन हैं? तब उन्होंने डांटते हुए इतना ही कहा था कि जो जानना और पढना है, वह तो कभी नहीं पूछते हो. सुनो-मडई दुबे पंडीजी थे आरा के. डोमिन से बियाह कर लिये थे.
खैर! समय बितता गया और मैं प्रेम का जुनून, प्रेम की पूजा, प्रेम का उत्सर्ग, प्रेम का मतलब अंगरेजी के इन्हीं दोनों वाक्यों से जानता रहा. हाई स्कूल में पहंुचा तो किसी ने अंगरेजी का एक नया वाक्य भी बता दिया- लव बीगेटस लव!
उन्हीं दिनों एक भोजपुरी फिल्म भी देखने का मौका मिला था- पिरितिया के खेल. तब पिरितिया का कौन सा खेल सिनेमा हाॅल में चला था, तब जरा भी समझ में नहीं आया था. हां, हाॅल में लोग जोर-जोर से ताली बजा रहे थे, आगे बइठे हुए लोग लाॅटरी उडा रहे थे, सिटी बजा रहे थे परदा के सामने, यह जरूर याद था.
लेकिन पिछले दिनों उस सिनेमा की याद एकबारगी से आ गयी. आरा-छपरा के इलाके में जाना हुआ था. छपरा में कुछ लोगों ने महेंदर मिसिर और ढेलाबाई की प्रेम कथा को सुनाया लेकिन दिल खोल कर नहीं. ऐसे बता रहे थे, जैसे महेंदर मिसिर कउनो बहुत बडा अपराध कर दिये थे. लेकिन उसी छपरा में मडई दुबे का नाम फिर सुनने को मिला. लोगों ने बताया कि अजी प्यारे के कहानी जाने के बा त मडई बाबा के जानीं. उहो एगो गजबे के प्रेमी भइलन. मडई दुबे का नाम सुनते ही मास्साब की याद आ गयी.
छपरा रूकना नहीं हो सका था, सो सिर्फ इतना ही जान कर रह गया कि मडई बाबा के प्रेम कहानी लोकमानस में रचा-बसा है. आरा आया तो सबसे पहले लोक मानस में मडई दुबे को ही तलाषना षुरू किया. कुछ ने नाक-भौं सिकोडे लेकिन अधिकतर ने गर्व से, एक रिदम के साथ, संवाद में भी आरोह-अवरोह का ध्यान रखते हुए बताया-सुनाया. कुछ ने तो चटखारे भी लिये.
लेकमानस में जो कहानी रची बसी है और जो सुनाया गया, उसका साार यह है कि मडई दुबे आरा के सलेमपुर गांव के रहने वाले थे. इलाके के नामी पहलवान. गृहस्थ परिवार से ताल्लुक रखते थे. मडई दुबे अपने गांव के पास ही गंगा किनारे रोज जाया करते थे. कुछ ने बताया खेत-बधार देखने तो कुछ ने बताया कि नहीं गाय चराने. खैर! कम जो भी करने जाते हैं, उससे उनके व्यक्तित्व पर कोई फर्क नहीं पडता. वहीं गंगा किनारे एक डोम का परिवार बसा हुआ था. उसकी झोपडी वहीं थी. डोम परिवार की ही सदस्य थी- सुगमोना. सुंदर युवती. पता नहीं देखते-देखते कब मडई दुबे का दिल सुगमोना पर आ गया और सुगमोना को भी मडई को एक बार रोज-ब-रोज भर नजर देखना जीवन की जरूरतों में षामिल हो गया. रोज ब रोज लुक-छिपा के देखा-देखी की आदत, बतकही में बदल गयी. मडई दुबे हर दिन कोई न कोई ऐसा अवसर जरूर निकाल लेते कि सुगमोना से उनकी बातचीत हो जाये और जैसे सुगमोना भी उस अवसर का इंतजार ही करती रहती थी. यह बात धीरे-धीरे गांव में फैल चुकी थी. मडई गांव के जिस गली से गुजरते-टोंटबाजी होती- जा ए मडई, तोके अउरो कोई ना मिल. नामें हंसावत बाड.
मडई पर इन सभी बातों का कोई असर नहीं पडता. तब गांव वालों ने धमकी दी कि डोमिनिया से मिलल, ओकरा से बोलल बतियावल छोड द, ना तो गांव और जाति, दुनों से निकाल देबल जाई. मडई अपनी धुन में थे, यह धमकी भी बेअसर. जब कोई बहुत छेडे तो मडई बस इतना ही कहते- हमार बात क ेले के गांव काहे परेषान बा और जेकरा जे करेके बा, करे, अब हमार जीवनसंगीनी तो सुगमोनवा ही बनीे.
मडई दुबे पर जब बातों का असर नहीं हुआ तो गांव की पंचायत बैठी और फैसला सुनाया गया- मडई को गांव और जाति दुनों से बेदखल किया जाये. फैसले के पहले ही मडई गांव छोड कर सुगमोनाकी झोपडी में रहने चले गये थे. और उस पंचायत मेंसुगमोना के साथ यही कह गये कि तु लोग का निकलब जा गांव से, जाति से- हम खुदे ना रहल चाहब अइसन जानवरन के बीच में, कुजातन के बीच में-जेकरा दिल में प्यार खातीर कउनो जगहे नइखे.
लोग बताते हैं कि बहुत दिनों तक उसी झोपडी में गांव छोडकर मडई दुबे सुगमोना के साथ रहते रहें. गांव वालों द्वारा प्रताडना का दौर तब भी नहंी थमा तो वे सदा के लिए वह गंगा तट छोड कर गजराजगंज में रहने आ गये.
फिर क्या हुआ? आगे और जानने की इच्छा थी. बताया गया कि मडई और सुगमोना का आल-औलाद हुआ. तो अब कहां है आल औलाद? किसी ने बताया- अब का बात पूछ रहे हैं- बहुत बडा आदमी बन गया है उनका वंषज. बढका बिजनेसमैन.
मैंने पूछा कि अउर कुछ बताइये मडई दुबे के बारे में? किसी ने कहा कि एतना पूछ रहे हैं तो काहे नहीं एक बार पिरितिया के खेल सिनेमा देख लेते हैं. उनही पर तो बना था. मुझे अचानक से याद आ गया वह दिन जब मैं सिनेमा हाॅल में उस फिलिम को देखने गया था लेकिन कहानी याद ही नहीं आ रही थी. लेकिन गंगा, गंगा किनारे वह झोपडी, वह पहलवान जैसा एक हीरो, एक सुंदर हिरोइन हल्की-हल्की याद आने लगी.
मैंने आखिरी सवाल पूछा आरा के उस चैपाल में. इ कब के बात है. कब हुए थे मडई दुबे. अपने अंदाज में बताये एक सज्जन- कब का कउनो इ सैकडा बरिस पुराना बात है. अभिये, एही सदी के बात है- हो रहा होगा 70-80 साल. अभिये हाले बरिस में तो दुनिया से विदा हुए हैं मडई बाबा.
मैंने एक सवाल और पूछ लिया- मडई नामे था का उनका?
जवाब मिला- अब इ तो नहीं बता सकते हैं. हो सकता है सुगमोना के मडई में रहने चले आये हों सब छोड छाड के, एह से भी नाम पड गया हो. इ तो सलेमपुरे में सही-सही पता चलेगा.
किसी ने इस प्रेम कहानी में एक और नयी चैपाली टूनकी मारी- कहानी तो एगो अउर है उनक रनाम के पीछे. हम तो इ भी सुने हैं कि जब मडई दुबे सब छोड छाड के सुगमोना के साथ गंगा किनारे रहने लगे तो गांव वालों ने फिर एक फरमान सुनाया कि अगर इहां रहना है और मडई के सच्चो में एतना प्रेम है सुगमोना से तो उ मडई पर चढ के पेषाब करेगी अउर मडई दुबे को नीचे खड हो के उसे पीना होगा. बताते हंै कि प्रित के परीक्षा की बारी आयी तो मडई दुबे और सुगमोना उसके लिए भी तैयार हो गये थे. लेकिन प्रताडना से तंग आकर और प्रेम को पहरेदारी से मुक्त करने के लिए आखिर में उन्होंने वह इलाका छोड देने का ही फैसला किया.
मैं मडई दुबे के बारे में और जानकारी लेने सलेमपुर नहीं जा सका लेकिन उस एक प्रेम का मानस पर प्रभाव आरा-छपरा के इलाके में ही महसूस कर आया. उसी प्रेम पर, जो कभी कलंक बांेध सा लगा था, अब गर्व की बात है.
आरा से आते समय स्कूल के मास्साब भी याद आये. मैं खुद से ही संवाद करता रहा कि मास्साब गुस्से में भी कोई गलत उपमा नहीं देते थे ....

बिदेसिया के निहोरा बा

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