SANS

यह चटखारे लेने के लिए

50वें साल में शर्मनाक दौर से गुजर रहा है भोजपुरी सिनेमा

फिलम ‘देसवा’ से चरचे में आये युवा निर्देशक नीतीन से निराला की बातचीत


- भोजपुरी सिनेमा जब अपनी यात्रा के 50वें साल में पहुंच रहा है, तब आपका इसमें सक्रियता से आगमन हो रहा है. बतौर युवा निर्देशक वर्तमान और भविष्य को कैसे रेखांकित करना चाहेंगे?

-- इसके जवाब में मैं एक ही प्रमुख बात कहना चाहूंगा कि 50 वर्षांे की यात्रा की प्रमुख उपलब्धि यह है कि जो भोजपुरी बोलनेवाले हैं, वही भोजपुरी सिनेमा नहीं देखना चाहते. वही अपनी भाषा की फिल्मों से दूर हो गये हैं. वर्तमान दौर में भोजपुरी फिल्मों के जो पोस्टर लगते हैं, फिल्मेां के जो नाम होते हैं, उसे देखकर कोई अभिभावक क्यों अपने बच्चों को, अपने परिवार के सदस्यों को भोजपुरी फिल्में देखने की इजाजत देगा. लेकिन फिल्मंे बन रही हैं, दनादन बन रही हैं. देश के अलग-अलग हिस्से से पैसे लगाये जा रहे हैं. दक्षिण से लेकर पश्चिम तक से पैसे लग रहे हैं, सबको पैसा चाहिए. सबको पता है कि पैसा कहां से बनाया जा सकता है.

- सफर आगे बढ़ने के साथ-साथ चकाचैंध तो बढ़ रही है, फिल्मों और कलाकारों की संख्या भी बढ़ रही है लेकिन जमीनी पकड़ मजबूत होने की बजाय कमजोर ही होते जा रहा है?

-- इसकी कई वजहें हैं. सिनेमा को सिर्फ सिनेमा के नजरिये से देखने की जरूरत नहीं. आप जब किसी मराठी से मिलेंगे तो वह अपनी भाषा, संस्कृति, खान-पान का बखान करेगा. दो बंगाली कहीं मिल जायें, कहीं रहने लगें, आपस में बांग्ला में बात करेंगे, बांग्ला की सांस्कृतिक परंपरा को बनाये रखेंगे. मैं यह नहीं कहता कि आप भाषा-संस्कृति को लेकर ‘ राज ठाकरे’ टाइप हो जायें लेकिन अपनापन, लगाव तो होना चाहिए न! हम पलायनवादी होते जा रहे हैं. अब दिल्ली बिहार-झारखंड बन गया है. मुंबई उत्तरप्रदेश बन गया है. दिल्ली के किसी भी एकेडमिक संस्थान में जायें, हर दूसरा-तीसरा बिहारी-झारखंडी मिलेगा, पूर्वांचल का होगा, क्या उनको ध्यान मे रखकर भोजपुरी फिल्में बनेंगी तो वे नहीं देखेंगे. जरूर देखेंगे. मैं जब अपनी फिल्म ‘देसवा’ में काम करने के लिए पटना के थियेटर कलाकारों से बात कर रहा था तो वे भोजपुरी सिनेमा में काम करने को तैयार नहीं हो रहे थे. शारदा सिन्हा जी, जिनकी पहचान ही भोजपुरी लोकगायन को लेकर है, भोजपुरी सिनेमा में गाने को तैयार नहीं थीं. सब झेेंप जा रहे थे. ऐसी स्थिति है भोजपुरी फिल्मों की.

- जिस तरह से भोजपुरी की पहली फिल्म डाॅ राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं के इच्छाशक्ति और चाहत की वजह से बन सकी थी, अब वैसा राजनीतिक संरक्षण क्यों नहीं मिलता भोजपुरी फिल्मों को?

-- इसके लिए राजनीति और भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री, दोनों की चाल और स्थिति को देखना होगा. एक उदाहरण लेते हैं. बिहार के अंदर मधुबनी आर्ट बेहद प्रतिष्ठित है. उसी आर्ट से जुड़े हुए एक शख्सियत हैं कृष्ण कुमार कश्यप. उन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर दुनिया भर में अपनी पहचान बनायी है. उन्हें दुनिया भर में बुलाया जाता है लेकिन आज तक उन्हें बिहार सरकार ने कभी एक छोटा सम्मान देकर भी सम्मानित किया. लोग भी नहीं जानते उन्हें. बिहार में कितने सेंटर फाॅर परमाॅर्मिंग आर्ट के केंद्र हैं? कोई एक सेंटर आॅफ एक्सेलेंस है! तो आप समझ सकते हैं राजनीति का कला-संस्कृति के प्रति क्या नजरिया है. दूसरी ओर भोजपुरी फिल्मों को देखिए, वर्बल पोर्नोग्राफी फिल्में बन रही हैं. तो लोग भी कटते जा रहे हैं. दिल्ली आदि में पहले कातिल हसीना, गरम जवानी, जवानी जानेमन जैसी फिल्मों के पोस्टर दिखते थे, अब वह बाजार से गायब हो गये हैं. उसकी जरूरत ही नहीं है. उसे देखनेवाले लोगों को अब अपनी भाषा में वैसे ही दृश्य देखने को मिल रहे हैं. अगर भोजपुरी फिल्म जगत को एक इंडस्ट्री माने और फिल्मांे को एक प्रोडक्ट तो उस प्रोडक्ट की मांग को बनाये रखने के लिए मध्य वर्ग का इससे जुड़ाव होना जरूरी है लेकिन भोजपुरी फिल्मों से उनका जुड़ाव नहीं है. भोजपुरी फिल्में ‘ शीला की जवानी’ के भरोसे है, कितने दिनों तक! इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि 50 वर्षों के सफर के बाद भी किसी जमीनी मसले पर फिल्म बनाने में असुरक्षा की भावना है. क्यों?

-- किसको दोष दें? निर्माता, निर्देशक, कलाकार या अंततः दर्शकों के मत्थे मढ़ दें कि वे जो चाहते हैं, वही हो रहा है?

-- किसी एक को कैसे दोषी ठहराया जा सकता है. अपनी चीजों पर गर्व करना तो शुरू करें हम. मराठी, बांग्ला आदि भाषा के टीवी चैनलों को गौर से देखिए, कैसे वे अपनी संस्कृति के भी संरक्षक बने हुए हैं. हिंदी के इंटरटेनमेंट चैनलों में भी जब दूसरे भाषा-भाषी अपना प्रदर्शन करते हैं तो उनमें गौरव का भाव होता है. और हमारे यहां ‘ बिरहा नाईट’ करवा दीजिए पटना जैसे शहरों में तो लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगेंगे. मैं दर्शकों को दोष नहीं देता लेकिन लोगों को भी अपनी सांस्कृतिक पहचान, भाषायी सम्मान के प्रति सजग होना होगा. क्योंकि अंगिका-बज्जिका जिस हाल में अभी पहुंच गयी है, उस हाल में मगही-भोजपुरी भी न पहुंचे, इसके लिए ऐसा करना जरूरी होगा. फिल्म बनाने के पहले मैं भी कई जगहों पर शूटिंग देखने जाया करता था. एक जगह गया. भोजपुरी के सुपर स्टार का शूटिंग चल रहा था. जाकर उनके असिस्टेंट से पूछा कि किस फिल्म की शूाटिंग चल रही है. असिस्टेंट ने कहा कि नहीं मालूम. कैमरामैन से पूछा कि भईया किस फिल्म को शूट कर रहे हो, नाम क्या है फिल्म का- उसने बोला, आई डोंट नो... सब शर्म से नहीं बताते क्योंकि फिल्म का नाम होता है हमरा हउ चाही, चूम्मा दे द आदि. अब रहते हैं मुंबई के पाॅश काॅलोनी में तो कैसे कहेंगे कि हमरा हउ चाहीं, हई चाहीं में अभिनय कर रहे हैं. अधिकतर कलाकार भोजपुरी बोलना नहीं जानते, बोलना पसंद नही ंकरते. लेकिन पैसा बनाने में लगे हुए हैं. कलाकारों और डिस्ट्रीब्यूटर के बीच जबरदस्त किस्म का नेक्सस है.एक से एक, अच्छी-अच्छी भोजपुरी फिल्में बनकर रखी हुई हैं लेकिन डिस्ट्रीब्यूटर और कलाकार उसे रीलिज नहीं होने दे रहे हैं. उन्हें अपने किस्म का बाजार बनाना है. 50वें साल में शर्मनाक दौर से गुजर रहा है भोजपुरी सिनेमा.

- इस भंवरजाल में संभावनाएं और उम्मीद कहां है बेहतरी की. आप कहते हैं कि गंभीर विषयों पर, साफ-सुथरी फिल्में बनायेंगे. कैसे निकाल पायेंगे रास्ता, पैसा कौन लगायेगा?

-- मैं उम्मीदों के सहारे जीता हूं. मैंने खुद भोजपुरी फिल्मों को ही बनाने का निर्णय लिया है. मैं सब कुछ बदल दूंगा, इतनी बड़ी बातें तो नहीं करता लेकिन ‘ अपने आप से शुरूआत करो’ के फाॅर्मूले को मानता हूं. पोलिटिक्स और पाॅलिसी दोनों बदलनी होगी, तभी बेहतरी की उम्मीद है. भोजपुरी सिनेमा संसार को दो-तीन बार करारा झटका लग चुका है. ऐसे ही दौर ने झटके दिये थे. अभी स्थिति है िक या तो गर्त में समाकर फिर से लंबे समय के लिए दृश्य से गायब हो जायेगा या फिर इससे उबरकर संभावनाओं के नये द्वार खोलेगा. मैं यह मानता हूं कि गर्त में नहीं समायेगा. हिंदी के बाद सबसे बड़ा उपभोक्तावादी बाजार भोजपुरी पट्टी में ही है. भोजपुरी फिल्मों को उनके लेवल का बनाना होगा. उनकी अपनी कहानी को विजुअल ट्रीटमेंट देकर संभावनाएं बनायी जा सकती हैं. जब अच्छी फिल्में बनेंगी तो भोजपुरी सिर्फ भोजपुरीभाषी जिले की भाषा भर नहीं रह गयी है. लेकिन इसके लिए लोगों को, बौद्धिक वर्ग को निगहबानी करनी होगी. लोगों को पूछना होगा कि ये ठाकुर, डकैत को लाकर रेप-वेप जो जबरिया दिखाये जा रहे हो, यह क्या है. भोजपुरी सिनेमा भी एक बड़ा घोटाला ही है. करोड़ों लोगों की भाषा, भावना और संस्कृति से खेलकर सिर्फ पैसा बनाने का काम चल रहा है. मैं खुद भोजपुरी भाषी हूं और जब भोजपुरी फिल्में बनाने की बात करता हूं तो मुझसे ही पूछा जाता है कि भोजपुरी में क्यों पड़ रहे हो? क्या कोई ऋतुपर्णो घोष से जाकर यह पूछ सकता है कि बांग्ला क्यों बनाती हैं. अभी तो भोजपुरी फिल्मों में अधिकांश पैसा दूसरे हिस्से से लग रहा है. जब अच्छी फिल्में बनने लगेंगी, कटे हुए लोग जब जुड़ेंगे तो पैसा भी आने लगेगा, पैसा लगानेवाले भी सामने आने लगेंगे.

बिदेसिया बिसेस: भिखारी ठाकुर

भोजपुरी सिनेमा के 50 बरिस

चिठी-पतरी, आख्यान-व्याख्यान

नदिया के पार के 25 वर्ष

दामुल के 25 साल

25 Yrs of Damul

एगो ऐतिहासिक क्षण

Contact Bidesia