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यह चटखारे लेने के लिए

‘‘ निगरानी की बजाय सब अपना बेहतरीन दें, तब तो बात बने’’

कल्पना से निराला की बातचीत

भोजपुरी फिल्मों ने 50 वर्षों के सफल सफर में गीत-संगीत की भूमिका सबसे अहम रही है. गीत-संगीत की दृष्टि से इस दौर को कैसे देखती हैं?
- इस दौर में तो मैं शामिल हूं हीं लेकिन काश मैं पहले दौर के गीतों को भी गा पाती. पहले दौर के भोजपुरी फिल्मी गीतों में शब्दों के चयन से लेकर संगीत तक में जादुई असर होता था. वैसे इस दौर में मैंने - सईंया जी दिलवा मांगेलन, गमछा बिछाई के... गीत को गाया तो लोगों को काफी पसंद आयी.

- आप अपने जिस गीत को बेहतरीन गीत बता रही हैं, उसे लेकर तो लोग यह भी कहते हैं कि ऐसे गीत-संगीत ही सत्यानाश कर रहे हैं.
- हर चीजों का अपना महत्व होता है. मुझे लगता है कि भेाजपुरी सिनेमा जगत की सबसे कमजोर कड़ी यह है कि उसने लोवर क्लास को ही अपना दर्शक वर्ग मान बैठा है और मध्य वर्ग या उच्च वर्ग में पैठ बनाने की कोशिश ही नहीं कर रहा. यह कोशिश नहीं होगी तो फिर... वैसे मैंने खुद की कोशिश जरूर की है. टाईम्स म्यूजिक से भिखारी ठाकुर के गीतों का सोलो अलबम लायी हूं. यह मेरी खुद की कोशिश थी, मैं उस अलबम को करते हुए, बिल्कुल अलग दुनिया में रही. अब तक की संगीत यात्रा में सबसे यादगार, प्रेरक और रोमांचक रहा. मैं इसलिए टाईम्स म्यूजिक में गयी ताकि माॅल में, प्लेनेट एम में भी भोजपुरी मिले, उसके अलबम पर भी 25-30 रुपये की जगह 250-300 रुपये का टैग लगे.

- बेशक, भिखारी ठाकुर पर किया हुआ आपका यह हालिया काम बेशकीमती है और इसे काफी सकारात्मक तरीके से देखा भी जा रहा है लेकिन लोग यह भी कहते हैं कि कल्पना ने भोजपुरी अश्लील और द्वीअर्थी गीतों को गाने का मिसाल भी कायम किया है. आपको भी लोग सीधे-सीधे ऐसा कहते हैं?
यही तो सबसे बड़ी समस्या है भेाजपुरी की. अरे कल्पना क्या कर रही है, इसे देखने की बजाय, सब अपना-अपना बेस्ट क्यों नहीं कर रहे.मैं तीन-चार साल मेहनत कर भिखारी ठाकुर के अलबम लेकर आ रही हूं. दूसरे भी करें. सभी अपना रचनात्मकता का बेहतर उपयोग करें, इससे भोजपुरी का भला होगा. कहते हैं, मुझसे भी कहते हैं लेकिन अधिकांश नेक नियत से नहीं कहते. मुझे कोई भी अभिभावक की तरह समझाता है िकइस गाने को नहीं गाना है, मैं कहीं भी,कभी भी मंचों पर नहीं गाती. यह किसी से पूछा जा सकता है. जो भी मुझे अपना मानते हैं, अपनापन के साथ हिदायत देते हैं, मैं कभी उनकी बातों को नहीं काटती. और फिर मैं खुद महसूस करती हूं. मेरा मुकाबला अगर खुद से है तो मैं खुद की समीक्षक भी हूं. वीर कुंवर की धरती अलबम मैंने ही लाया था, भोजपुरी गजलों का संग्रह ‘ ताजमहल’ भी लाया, उसे भी तो देखें.

- खैर! यह बतायें कि भोजपुरी को बदनामी से मुक्ति कब मिलेगी? कब तक ऐसे गीतों के सहारे इंडस्ट्री का भविष्य देख रही हंै?
- इंडस्ट्री का भविष्य तो बेहतर दिख रहा है लेकिन वर्तमान पैटर्न पर चलकर नहीं. 2000 के बाद से भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में लगातार ग्रोथ हो रहा है. यहां यह गौर करने वाली बात है कि भोजपुरी माटी की खुश्बू ऐसी है कि इसके लोकतत्वों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. आज भी बाॅलीवुड की अगर कोई बड़े से बड़े बजट की फिल्म बने और उसमें गांव-देहात-कस्बा- असली भारत को दिखाना होता है तो वहां भोजपुरी भाषा ही सबसे ज्यादा प्रभावशाली होती है, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, बांग्ला, मलयालम नहीं. भोजपुरी गीत भी अपने रूट पर लौटेगा, क्योंकि इसे मध्य और उच्च वर्ग से जुड़ना होगा, तभी लंबी दूरी तय होगी.

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