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यह चटखारे लेने के लिए

सिनेमा में भोजपुरी गीतों के सफर का यह 62वां साल

भोजपुरी सिनेमा का भले ही यह 50वां साल हो लेकिन सिनेमा में भोजपुरी गीतों के सफर का यह 62वां साल है. आजादी के तुरंत बाद 1948 में एक हिंदी फिल्म आयी थी ‘ नदिया के पार’. दिलीप कुमार और कामिनी कौसल मुख्य भूमिका में थे. उस जमाने में यह फिल्म अपने गीत-संगीत की वजह से दर्शकों के दिल में जगह बना ली थी और यह जानना दिलचस्प है कि उस फिल्म के आठों गीत भोजपुरी में थे. मशहूर गीतकार मोती बीए, जो भोजपुरी भाषी थे, उन्होंने ही सारे गीत लिखे थे. भोजपुरी फिल्म के इतिहासकार मनोज सिंह भावुक बताते हैं कि मोती बीए के गीतों का जादू का असर यह हुआ था कि उसके बाद फिल्में भले ही भोजपुरी में बनाने का कोई साहस नहीं कर पा रहा था लेकिन हिंदी फिल्मों के गीतों में भोजपुरी का प्रभाव बढ़ने लगा. इस तरह देखें तो फिल्मी जगत में भोजपुरी गीत-संगीत का सफर पहली फिल्म निर्माण से भी 12 साल पहले का रहा है. फिर जब पहली फिल्म ‘ हे गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो’ फिल्म आयी तो इसके गीत भी काफी मशहूर हुए. चित्रगुप्त जैसे संगीतकार, शैलेंद्र जैसे गीतकार का जादू भोजपुरी फिल्मों में देखने को मिला. बाद में अनजान भी जुड़े. सफर के शुरआत में ही मन्ना डे, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, महेंद्र कपूर, आशा भोसले जैसे चोटी के गायक कलाकारों ने भोजपुरी फिल्मी गीतों को गाकर इसे सदा-सदा के लिए अमर बना दिया. भावुक कहते हैं कि पिछले दस सालों में भोजपुरी फिल्में तो दर्जन के भाव से बनी लेकिन उन फिल्मों का कोई एक गीत ऐसा है क्या जो पुराने भोजपुरी गीतों की तरह घर-घर में,लोकमानस में जगह बना सका हो. सच भी ऐसा ही है. मन्ना डे की आवाज में ‘ लाली-लाली होठवा से चुएला ललईया हो..., लता मंगेशकर की आवाज मे राखी गीत- रखिया बंधा ल भइया सावन आईल..., आशा भोंसले की आवाज में एक तो चढ़ल जवनिया..., किशोर कुमार के आवाज में जाने कईसन जादू कईलु मंतर देहलू मार...या गोरकी पतरकी रे, कहे के तो सबे केहु आपन, मेला में सईयां भुलाइल हमार, आइल तूफान मेल गड़िया हो... गीत आज भी सबसे ज्यादा पसंद किये जाते हैं. लेकिन वक्त के साथ भोजपुरी फिल्मों के गीत-संगीत से पैरोडी-मेलोडी गायब होता गया. उसकी जगह द्वीअर्थी गीतों ने लिया. संगीत में हिंदी की नकल और गीत के मामले में अश्लीलता का पर्याय बनता गया. गीत-संगीत की फूहड़ता की वजह से एक बड़ा वर्ग तो भोजपुरी फिल्मों से जुड़ता गया. लुधियाना, दिल्ली, कोलकाता से लेकर अन्य शहरों में, जहां भोजपुरी भाषी मजदूर काम करते हैं, फिल्में चलने लगीं लेकिन परिवार कटता चला गया. हाल यह है कि हर साल60-70 फिल्में बन रही हैं लेकिन छह-सात गाने भी यादगार नहीं बन पा रहे. भोजपुरी फिल्मी गीतों के नाम पर आज भी पुराने गीतों का जादू ही असरदार है.

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