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25 Yrs of Damul | दामुल के 25 साल

 

‘‘ बुद्धिजीवियों और शुद्धतावादियों को सक्सेस चीजें बर्दाश्त नहीं होती’’ं

आप बुद्धिजीवियों की बात नहीं कीजिए. आमलोगों और सामान्य तौर पर सजग दर्शकों से बात कीजिए, उनसे पूछिए कि उन्हें गंगाजल, अपहरण, मृत्युदंड या राजनीति पावरफुल पोलिटिकल फिल्म लगती है या नहीं. दरअसल बुद्धिजीवियों और शुद्धतावादियों को काॅमर्शियली सफल चीजें बर्दाश्त नहीं होतीं. ऐसा होने पर वे सब सत्यानाश करने पर पड़ जाते हैं. ‘ दामुल’ अपनी जगह पर, समय-देस-काल-परिस्थिति के अनुसार बेहतर फिल्म है, इससे कहां इंकार है.

काश! ‘दामुल के रास्ते चलता बाॅलीवुड लेकिन वह तो सपना दिखानेवाला संसार रचने में ही लगा रहा

दामुल में हमने पनहा व्यवस्था को उठाया है यानि जानवरों को चुराकर उसके एवज में पैसे की मांग करना. अब आदमी का अपहरण हो रहा है और पनहा की जगह फिरौती मांगी जाती है. पूरे हिंदुस्तान में मानसिकता में बहुत बदलाव नहीं हुआ है. दामुल के वक्त भी पुलिस और कानून व्यवस्था भ्रष्ट थी, पहुंच वाले लोगों का साथ देती थी. व्यवस्था अब भ्रष्टतम रूप में है और रसूख वालों का अब भी कुछ नहीं बिगड़ता.

साधारण कहानी, असाधारण संवाद-गांव के ठेठ मुहावरों के साथ देसी छौंके

- चमार को भोट देने के लिए कहियेगा बच्चा बाबू तो ई तो सुअर के गुलाबजल से नहवावे वाला बात हुआ न! एक बेर किलियर बेरेन से सोच लीजिए बच्चा बाबू.
- बेरेन तो आपलोगों का मारा गया है. अरे गोकुलवा को खड़ा कउन किया है? हम. जितायेगा कउन? हम. तो राज का करेगा चमार. आपलोग समझिये नहीं रहे हैं. बाभन के राज को खत्म करने के लिए ईहे आखिरी पोलटिस बच गया है.

25 साल पहले का बिहार, 25 साल पहले की एक फिल्म

निराला
न कोई फिल्मी लटका-झटका, न ही खुशी-गम, न प्रेम-प्यार-इश्क-मोहब्बत का रोनी धुन। गीत-संगीत का जलवा भी नहीं कि जुबान पर चढ़ जाये और लोगों को सिनेमा हॉल तक पहुंचा दे। 25 साल पहले बिहार में बिहार की समस्या पर एक ऐसी ही फिल्म बनी थी, दामुल। उस जमाने में दो रचनाकारों की परिकल्पना मायावी परदे पर उतरी थी, लेकिन मायाजाल कहीं नहीं था

एहो देखीं जा

 

‘‘वे खुद को खेवनहार बताते हैं, मुझे बहुत तरस आता है उनपर’’
कुणाल सिंह

भोजपुरी सिनेमा 50 वर्षों की यात्रा पूरी कर रहा है. काफी गौरवान्वित महसूस करता हूं खुद को. शुक्रिया अदा करता हूं विश्वनाथ शाहाबादी, नाजिर हुसैन, एएसएन त्रिपाठी, सुजीत कुमार, कुमकुम, पद्मा खन्ना जैसे लोगों का, जिन्होंने तमाम मुश्किलों, चुनौतियों को झेलकर इस भाषायी फिल्मी संसार के लिए जमीन तैयार की, इसे खड़ा किया. मेरा भी भोजपुरी फिल्म जगत में सक्रियता का यह 30वां साल है. 80 के दशक मंे मैं इससे जुड़ा था. तब मुश्किलों का दौर था. लेकिन इस इंडस्ट्री से जुड़े कर्मठ लोगों से प्रेरणा पाकर एक जुनून का भाव जगा. यह अपनी भाषा है, संस्कृति है, इसी जुनून के साथ सभी काम करते थे. आज की तरह तब मीडिया का भी स्वरूप और सरोकार इतना व्यापक नहीं था. इलेक्ट्राॅनिक मीडिया तो था ही नहीं, प्रिंट मीडिया के पत्रकार भी भोजपुरी सिनेमा पर कलम चलाने से बचते थे. एक किस्म की हीन भावना मन में भरी रहती थी. प्रचार-प्रसार के मंच कम थे. लेकिन इन सारी कमियों और मुश्किलों के बावजूद ऐसी फिल्मों का निर्माण होता था कि उसका असर व्यापक होता था. 25-25 सप्ताह तक कई फिल्में चलती थीं. कुछेक फिल्में तो 50 सप्ताह भी. आज तो एक फिल्म 25-50 दिन चल जाये तो उसे सुपरहिट करार दिये जाने लगता है. गीत-संगीत ऐसे रचे जाते थे कि लोकजुबान पर हमेशा के लिए छा जाते थे. फिल्मों में इनोसेंसी, माटी की महक होती थी, पारिवारिक संस्कार, रीति-रिवाज दिखता था, तो उसे देखने घर-परिवार से लोग जाया करते थे. बगैर किसी मीडियाई प्रचार के, भोजपुरी फिल्मों के कलाकार लोगों के जेहन में रचे-बसे होते थे. आज प्लेटफाॅर्म बड़ा हो गया है, फिल्में अधिक बन रही हैं लेकिन अस्तित्व ही दांव पर लगा हुआ दिखता है. अब भोजपुरी फिल्मों में भोजपुरी के लोक तत्वों को छोड़ बाकि तमाम तरह की चीजें देखने को मिलती हैं. हमारे यहां चलन है कि होली के अवसर पर भौजाई के गाल में गुलाल लगाते हैं लेकिन उसी रोज उनके पांव भी छूते हैं. जब बारात आती है तो गांव भर की महिलाएं गाली सुनाती हैं लेकिन अहले सुबह जब बेटी विदा होती है तो पूरा गांव रोता है. पिछले एक दशक की भोजपुरी फिल्मों ने रीति-रिवाज-संस्कार को ही किनारे रख दिया है, जिससे भोजपुरी भाषी परिवार भी इससे तेजी से दूर हो गया. मैं कुपमंडूक नहीं कि वक्त के बदलाव के साथ चलने की बात नहीं करता लेकिन जरूरत के अनुसार. तकनीकी रूप से हम हिंदी फिल्मों से बेशक प्रेरणा लें लेकिन कहानी, गीत-संगीत के लिए क्यों उनकी ओर देखें. क्या हमारे यहां बेरोजगारी, पलायन, दहेज, राजनीति में अपराधियों का वर्चस्व यह सब विषय नहीं है. भिखारी ठाकुर ने तो समय से बहुत पहले इन विषयों को लिख दिया था. महेंदर मिसिर ने कितने लोकप्रिय गीत लिखे हैं. लेकिन वर्तमान दौरवाले इन सभी चीजों को बकवास मानते हैं, तब मन में निराशा का भाव पैदा होता है, डर लगता है कि इतनी मेहनत से खड़ा किया हुआ संसार कहीं अपना अस्तित्व ही न खो बैठे!
क्या कहूं, सब तो अपने छोटे भाई की तरह ही हैं लेकिन कभी-कभी हंसी भी आती है आज के कलाकारों, निर्माताओं-निर्देशकों पर, जो यह भ्रम पाले बैठे हैं या मीडिया में बयान भी देते हैं कि उनकी बदौलत ही भोजपुरी सिनेमा इस उंचाई तक पहुंचा है. यह अज्ञानतावश कहते होंगे तो इतिहास की जानकारी लेनी चाहिए. मुझे इनलोगों की समझदारी पर तब भी तरस आती है, जब वे बिहार में जाकर मीडिया बार-बार यह बयान देते रहते हैं कि यहां भोजपुरी फिल्म स्टूडियो का निर्माण होना चाहिए! यह भी कहते हैं कि इससे बहुत फायदा होगा. जो बिहार में स्टूडियो बनाने की मांग कर अपने को खेवनहार बताते फिरते हैं, कोई उनसे यह भी तो पूछे कि क्या वे खुद बिहार में ही रहने को तैयार हैं न! रात में भी रे-बैन का चश्मा लगाकर चलनेवाले शायद ही इसके लिए तैयार हों. खुद रहेंगे मुंबई में, उन्हें शूटिंग के लिए लेने मुंबई ही जाना होगा. गायक-गायिका भी मुंबई में ही रहेंगे, उनके लिए भी वहीं जाना होगा. किसी फिल्म में 100 घोड़े चाहिए या थोक में और भी कुछ चाहिए तो वह लाने भी मुंबई जाना होगा. तो एक स्टूडियो बना देने से क्या होगा. बचकाना बातें कर, अपने को शुभचिंतक, खेवनहार बतानेवालों की भींड़ लगी हुई है. क्यों न उसकी बजाय यह सवाल एकजुटता से उठाया जाये कि 50 करोड़ में बननेवाली बाॅलीवुड की फिल्मों से जितना टैक्स सरकार लेती है, उतना ही टैक्स एक करोड़ में बननेवाली भोजपुरी फिल्मों से भी क्यों?क्यों 50 वर्षों के बाद भी बिहार या उत्तरप्रदेश की सरकारें भोजपुरी सिनेमा को इतनी गंभीरता से नहीं लेती कि राजकीय सम्मान के नाम पर एक कागज का टूकड़ा तक देने की पहल करे? होना तो यह चाहिए कि सरकार से अनुरोध कर सबसे पहले ज्यादा से ज्यादा शूटिंग इन राज्यों में होना चाहिए. सरकार को बताना चाहिए कि शूटिंग होने से नये किस्म का रोजगार पनपेगा, जब कोई फिल्म यूनिट रहेगी तो स्थानीय लोगों को अवसर मिलेंगे. सरकार विशेष अनुदान की घोषणा करे कि जो भी यहां आकर कम से कम 80 प्रतिशत शूटिंग करेगा, उसे अनुदान राशि 20 प्रतिशत तक दी जायेगी. फिर सरकार यह भी शर्त रखे कि कम से कम 60 प्रतिशत स्थानीय लोगों को जोड़ना होगा. वक्त लगेगा लेकिन लोग आयेंगे, धीरे-धीरे माहौल बनेगा. नौजवान इस परिवेश से अपने को जोड़ेंगे. इतना कुछ होने के बाद स्टूडियो आदि बनाने की प्रक्रिया शुरू हो. ऐसे ही लफ्फाजी करना हो तो कुछ भी बोला जा सकता है.

- कुणाल सिंह पिछले 30 सालों से भोजपुरी सिनेमा में सक्रिय सर्वाधिक चर्चित अभिनेता हैं.

-प्रस्तुति -निराला
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Posted on 06 Mar 2011 by Nirala

 

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