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25 Yrs of Damul | दामुल के 25 साल

 

‘‘ बुद्धिजीवियों और शुद्धतावादियों को सक्सेस चीजें बर्दाश्त नहीं होती’’ं

‘ दामुल’ फिल्म के 25 साल पूरे होने पर निर्देशक प्रकाश झा से निराला की बातचीत

- आपकी पहली चर्चित, सफल व यादगार फिल्म ‘दामुल’ के 25 साल पूरे हो गये. अब के परिवेश में ‘दामुल’ की प्रासंगिकता को कैसे आंकते हैं आप?

प्रकाश झा- इतने वर्षों में सामाजिक व्यवस्था परिवर्तित हो चुकी है. अब जमींदार और मजदूरों के बीच रिश्ते वैसे नहीं रहे, जो दामुल के दौर में थे. बिहार संकीर्ण पगडंडियों से निकलकर अब विकास के रास्ते पर है. लालू प्रसाद और नीतीश कुमार जैसे नेताओं के नेतृत्व में बहुत कुछ बदल चुका है, बदल रहा है. लोकतांत्रिक बदलाव भी हुए हैं. पिछड़ी जातियों का सशक्तिकरण हुआ है, हो रहा है. तो अब ऐसे समय मंे ‘ दामुल’ जैसी फिल्म की कल्पना नहीं की जा सकती.

- लेकिन उसके ‘सिक्वल’ या ‘रिमेक’ की गुंजाइश तो बचती-बनती है....!

प्रकाश झाः- मैं कर क्या रहा हूं? दामुल के बाद उसकी सिक्वल ही तो बनाता रहा. जमींदार की जगह ठेकेदार आये, ठेकेदार की जगह नेता आये, सबको तो समेटते रहा अपनी फिल्मों में. आप देखिए दामुल के बाद आयी फिल्म मृत्युदंड को या उसके बाद गंगाजल, अपहरण या हालिया फिल्म राजनीति को, सभी एक-दूसरे के सिक्वल में ही तो है. स्थितियों, चरित्रों, मूल्यों में जैसे-जैसे बदलाव हुए, उसी रूप में फिल्मों के विषय, पात्र बदलते गये और अपने फिल्मों को बदलाव के साथ कदमताल करवाने की कोशिश मैंने हरसंभव की.
- आप पोलिटिकल फिल्मों को बनाने के लिए जाने जाते हैं. कुछ समीक्षक और विशेषज्ञ कहते हैं कि ‘ दामुल’ की तरह पोलिटिकल फिल्म फिर आप नहीं बना सके....?

प्रकाश झाः- आप बुद्धिजीवियों की बात नहीं कीजिए. आमलोगों और सामान्य तौर पर सजग दर्शकों से बात कीजिए, उनसे पूछिए कि उन्हें गंगाजल, अपहरण, मृत्युदंड या राजनीति पावरफुल पोलिटिकल फिल्म लगती है या नहीं. दरअसल बुद्धिजीवियों और शुद्धतावादियों को काॅमर्शियली सफल चीजें बर्दाश्त नहीं होतीं. ऐसा होने पर वे सब सत्यानाश करने पर पड़ जाते हैं. ‘ दामुल’ अपनी जगह पर, समय-देस-काल-परिस्थिति के अनुसार बेहतर फिल्म है, इससे कहां इंकार है.

- ... तो एक समय में बाजार के ग्रामर को झुठलाने और बदल देने वाले प्रकाश झा भी अब मानते हैं कि मार्केट फैक्टर एक अनिवार्य और सबसे महत्वपूर्ण शर्त है?
-
प्रकाश झाः- बिल्कुल. आप मार्केट फैैक्टर को नहीं समझेंगे, उसके साथ नहीं चल सकेंगे तो आपकी क्रीयेटिविटी बचने-बनने या बढ़ने की बात क्या, जिंदा भी नहीं बच सकती. क्रीयेटिविटी को जिंदा रखने के लिए उसके साथ कदमताल करना होगा. और फिर सिर्फ फिल्मों को ही क्यों देख रहे हैं? क्या आज के समय में आप बाजार को समझे बगैर राजनीति कर सकते हैं? आज देखिए कि हमारे देश की संसद में यह बार-बार सफाई देनी पड़ रही है कि देश के प्रधानमंत्री ईमानदार छवि के हैं, उन्हें संदेह के नजरिये से न देखें. क्यों? ताकि देश की जनता यह न समझ बैठे कि पीएम भी ईमानदार नहीं है. ऐसा समय है अभी. उस दौर में हैं हम सब. मार्केट का इनफ्लुएंस इस तरह का है. कुछ समय के लिए छोड़ दीजिए इन बड़ी-बड़ी बातों को. आज के समय में शिक्षा का महत्व सबके बीच बढ़ा है, हर वर्ग के लिए वह जरूरी और महत्वपूर्ण होता जा रहा है लेकिन उस सेक्टर में क्या हालत है? दो दशक पहले की शैक्षणिक व्यवस्था की अभी कल्पना तक नहीं कर सकते. अब उसका भी प्राइमरी लेवल से ही मार्केट पैकेज तैयार हो रहा है. तब ऐसे में इंटरटेनमेंट के मार्केट फैक्टर और मार्केट पैकेज पर क्या बात करना, क्यों ऐतराज जताना!

- 25 साल पहले जब ‘दामुल’ फिल्म आयी तो उसे हिंदी में, हिंदीवालों के द्वारा, हिंदी पट्टी की समस्याओं को केंद्र में रखकर मौलिकता और गहराई से रेखांकित करनेवाला पहली फिल्म माना गया. इस लिहाज से या फिल्म को मिले सम्मान, फिल्म के प्रभाव, समग्रता में फिल्म निर्माण के तमाम पक्ष अथवा प्रयोगधर्मिता के आधार पर भी उसे ‘ दो बीघा जमीन’, ‘ पाथेर पंचाली’ या ‘ मदर इंडिया’ जैसी माइलस्टोन फिल्मों की श्रेणी में जगह क्यों नहीं मिल सकी?

प्रकाश झाः- आप जिसे हिंदी पट्टी कह रहे हैं या जो हिंदी इलाके वाले लोग हैं, उन्हें कई-कई बातों से बड़ी तकलीफ होती है. खैर... छोड़िये उन बातों को, बांग्ला, तमिल, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम आदि भाषा-भाषियों का समाज सीमित होता है. हिंदी में यह मुश्किल है और इसका दायरा भी बहुत बड़ा और विविधता भरा है. हिंदीभाषी होते हुए भी आपस में ही क्षेत्रवाद के शिकार हैं. लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद मैं यही कहना चाहूंगा कि ‘दामुल’ को जो भी मान-सम्मान मिला, जितना भी रिस्पांस मिला, वह अच्छा रहा. और फिर यह क्या कम है कि 25 सालों बाद आज आप उस फिल्म पर बात कर रहे हैं, उसे याद करने को सोच रहे हैं, उसकी प्रासंगिकता तलाश रहे हैं.


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