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25 Yrs of Damul | दामुल के 25 साल

 

25 साल पहले का बिहार, 25 साल पहले की एक फिल्म

न कोई फिल्मी लटका-झटका, न ही खुशी-गम, न प्रेम-प्यार-इश्क-मोहब्बत का रोनी धुन। गीत-संगीत का जलवा भी नहीं कि जुबान पर चढ़ जाये और लोगों को सिनेमा हॉल तक पहुंचा दे। 25 साल पहले बिहार में बिहार की समस्या पर एक ऐसी ही फिल्म बनी थी, दामुल। उस जमाने में दो रचनाकारों की परिकल्पना मायावी परदे पर उतरी थी, लेकिन मायाजाल कहीं नहीं था। एक थे शैवाल जो अपनी लेखनी से एक साधारण-सी कहानी का फलक विस्‍तृत करते हुए एक गांव के प्लॉट में देश-दुनिया का सिस्टम बयान करने में लगे हुए थे तो दूसरे थे प्रकाश झा, जो बॉलीवुड के बने-बनाये तमाम फॉर्मूले को एक झटके में ध्वस्त कर रहे थे। बाजार को झुठलाकर एक नया फॉर्मूला गढ़ रहे थे। प्रकाश झा बिहारशरीफ दंगे पर एक डोक्यूमेंट्री फिल्म तथा हिप-हिप-हुर्रें जैसी फिल्म बना लेने के बाद भी बिहार में मजबूत कथानक की तलाश कर रहे थे। शैवाल और प्रकाश झा जैसे दो ठेठ समझ वाले रचनाकार मिले, तो ‘दामुल’ नाम से फिल्म बनी।
तकनीकी रूप से साल 1984 के आखिरी दिन यह फिल्म रीलीज हुई लेकिन व्यावहारिक तौर पर 1985 की फिल्म थी। बिहार के एक गांव की समस्या पर बनी इस फिल्म में पूरी हिंदी पट्टी ने अपने गांव की समस्या को तलाशना शुरू किया, देश भर के सिनेप्रेमी, समीक्षक और सिनेमा के पंडित हैरान रह गये कि भला ऐसी फिल्म भी बन सकती है और तब बड़े-बडे समीक्षकों ने सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा की कि हिंदी पट्टी की समस्या पर, हिंदी भाषा में, हिंदी वालों के द्वारा बनी यह भारत की पहली फिल्म है। फिल्म के कहानीकार शैवाल बताते हैं कि तब नेशनल फिल्म अवार्ड की बारी आयी तो अरविंदम की मलयालम फिल्म ‘मुखा मुखम’, सत्यजीत रे की ‘घरे बाहिरे’ और गौतम घोष की ‘पार’ जैसी फिल्मों को रेस में पछाड़कर ‘ दामुल’ ने अपनी जगह बनायी। लेकिन कहते हैं न कि वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है। रीतियां, नीतियां, पद्धतियां, प्रणालियां, महत्व, मान्यताएं… सब। प्रकाश झा भी बदले।

बकौल वरिष्‍ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज, प्रकाश झा की फिल्मों में अब वैसी राजनीतिक आवाज नहीं सुनाई पड़ती, जैसी कि दामुल में थी या उसके बाद मृत्युदंड में। जो दामुल को देखेगा, वह यह कहेगा कि प्रकाश झा की पकड़ बिहार के विषयों पर कमजोर हुई या फिर साहस में कमी आयी है। फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम कहते हैं कि ‘दामुल’ निश्चित तौर पर अपने समय की बेहतरीन फिल्म थी और एक लिहाज से हिंदी पट्टी की समस्या पर उस तरह की दूसरी फिल्म उस माहौल को दिखाते हुए नहीं बनी लेकिन अब इतने साल बाद उसके सिक्वल की गुंजाइश है और उसके रिमेकिंग की भी। दामुल एक इतिहास बन गया। अब नयी पीढ़ी के बीच प्रकाश झा की पहचान ‘अपहरण’, ‘राजनीति’ जैसी फिल्मों के माध्यम से है। नये नौजवान दामुल देखें तो रोम-रोम में सिहरन पैदा हो जाए कि क्या ऐसा भी होता था। लेकिन बिहार ने पिछले तीन दशक में कैसे करवट लिया है, इसे समझने के लिए लोक के बीच सबसे पॉपुलर विधा सिनेमा के जरिये यदि महसूसना हो तो ‘दामुल’ को देखा जा सकता है।
कहा जाता है कि बिहार की सामाजिक और राजनीतिक धारा जाति के खोल में बंधी रहती है। बिहार नक्सलियों के आंदोलन के कारण भी काफी चरचे में रहा। जातीय नरसंहार के लिए भी यहां की धरती काफी उर्वर रही। अब यह भी सुनने को मिलता है कि सब बीते दिनों की बात हुई। बिहार में विकास की राजनीति को अब मुख्यधारा की राजनीति माना जा रहा है। सच शायद बिल्‍कुल यही नहीं है। बिहार में कई ऐसे कोने हैं, जो आज भी सिसक रहे हैं। उस स्थिति की कल्पना से रोम-रोम में सिहरन पैदा हो सकती है। और यदि 25 साल पहले के बिहार के एक हिस्से को महसूसना हो तो इसे मुंहामुंही सुनने के बजाय जीवंत चित्रण के साथ एक फिल्म को देखकर समझा जा सकता है

एहो देखीं जा

 

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