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Bhojpuri Cinema 50 Yrs | भोजपुरी सिनेमा के 50 बरिस

 

भोजपुरी सिनेमा: भंवरजाल के 50 साल

film16 फरवरी 2011 को भोजपुरी सिनेमा 50वें साल में प्रवेश कर गया है. कई उतार-चढ़ाव और कुछ स्वर्णीम अनुभवों के दौर से गुजरने के बाद बाजार में एक बड़ी ताकत के तौर पर उभरा यह इंडस्ट्री द्वंद्व और दुविधा में अब भी फंसा हुआ है. भोजपुरी फिल्मों के 50 वर्षों की यात्रा के बाद मिले मुकाम की पड़़ताल -

‘‘वे खुद को खेवनहार बताते हैं, मुझे बहुत तरस आता है उनपर’’

क्या कहूं, सब तो अपने छोटे भाई की तरह ही हैं लेकिन कभी-कभी हंसी भी आती है आज के कलाकारों, निर्माताओं-निर्देशकों पर, जो यह भ्रम पाले बैठे हैं या मीडिया में बयान भी देते हैं कि उनकी बदौलत ही भोजपुरी सिनेमा इस उंचाई तक पहुंचा है. यह अज्ञानतावश कहते होंगे तो इतिहास की जानकारी लेनी चाहिए. मुझे इनलोगों की समझदारी पर तब भी तरस आती है, जब वे बिहार में जाकर मीडिया बार-बार यह बयान देते रहते हैं कि यहां भोजपुरी फिल्म स्टूडियो का निर्माण होना चाहिए!

बंजर जमीन अभी तो उपज लायक हुआ है

10 साल पहले यानि करीब वर्ष 2000 तक भोजपुरी फिल्म जगत कई उतार-चढ़ाव और घुमाव-फिराव-गिराव के दौर से गुजरते हुए बंजर जमीन की तरह हो गया था. काफी मेहनत करनी पड़ी. तब जाकर अब स्थिति ऐसी बन सकी है कि 80-100 अभिनेता-अभिनेत्री इस इंडस्ट्री से जुड़ सके हैं. साल भर में औसतन 75-80 फिल्में बनने लगी हैं. 700-800 करोड़ का सालाना टर्नओवर इस इंडस्ट्री का होने लगा है. 50 हजार से अधिक लोगों का चूल्हा अब इसी इंडस्ट्री के सहारे जलता है.

50वें साल में शर्मनाक दौर से गुजर रहा है भोजपुरी सिनेमा

फिल्म बनाने के पहले मैं भी कई जगहों पर शूटिंग देखने जाया करता था. एक जगह गया. भोजपुरी के सुपर स्टार का शूटिंग चल रहा था. जाकर उनके असिस्टेंट से पूछा कि किस फिल्म की शूाटिंग चल रही है. असिस्टेंट ने कहा कि नहीं मालूम. कैमरामैन से पूछा कि भईया किस फिल्म को शूट कर रहे हो, नाम क्या है फिल्म का- उसने बोला, आई डोंट नो... सब शर्म से नहीं बताते क्योंकि फिल्म का नाम होता है हमरा हउ चाही, चूम्मा दे द आदि.

भोजपुरी फिल्मों की दुनिया धोखाधड़ी की दुनिया है- मैनेजर पांडेय

मेरा ससुराल आरा में है. वहां एक बार गया था तो एक आदमी सड़क पर गाते हुए जा रहा था- आरा में आईल सर्कसवा, फोकसवा मरले बा...’ मेरे जेहन में तुरंत आया कि ऐसे पैरोडी का इस्तेमाल तो भोजपुरी फिल्मों में होना चाहिए. लोकभाषा के ऐसे ही मुहावरे तो क्षेत्रीय फिल्मों की जान होते हैं लेकिन भोजपुरी फिल्मवाले ऐसे प्रयोग नहीं करने देंगे. सब सिर्फ पूंजी का खेल खेलने में लगे हुए हैं.

‘‘ निगरानी की बजाय सब अपना बेहतरीन दें, तब तो बात बने’’

हर चीजों का अपना महत्व होता है. मुझे लगता है कि भेाजपुरी सिनेमा जगत की सबसे कमजोर कड़ी यह है कि उसने लोवर क्लास को ही अपना दर्शक वर्ग मान बैठा है और मध्य वर्ग या उच्च वर्ग में पैठ बनाने की कोशिश ही नहीं कर रहा. यह कोशिश नहीं होगी तो फिर...

सिनेमा में भोजपुरी गीतों के सफर का यह 62वां साल

आजादी के तुरंत बाद 1948 में एक हिंदी फिल्म आयी थी ‘ नदिया के पार’. दिलीप कुमार और कामिनी कौसल मुख्य भूमिका में थे. उस जमाने में यह फिल्म अपने गीत-संगीत की वजह से दर्शकों के दिल में जगह बना ली थी और यह जानना दिलचस्प है कि उस फिल्म के आठों गीत भोजपुरी में थे. मशहूर गीतकार मोती बीए, जो भोजपुरी भाषी थे, उन्होंने ही सारे गीत लिखे थे.

सुहाना सफर

50 सालों के सफर में भोजपुरी में कई ऐसी फिल्में बनीं, जिसे देखने दूर-दराज इलाके से लोग थियेटर एक-दो नहीं कई-कई बार पहुंचते थे. पहली फिल्म ‘ गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो’ का तो अपना जादू था ही, जिसमें शैलेंद्र के सदाबहार गीत, चित्रगुप्त के मनभावन संगीत के साथ कुंदन कुमार के निर्देशन में असीम कुमार और कुमकुम ने शानदार अभिनय किया था.

एहो देखीं जा

 

25 साल पहले का बिहार, 25 साल पहले की एक फिल्म
न कोई फिल्मी लटका-झटका, न ही खुशी-गम, न प्रेम-प्यार-इश्क-मोहब्बत का रोनी धुन। गीत-संगीत का जलवा भी नहीं कि जुबान पर चढ़ जाये और लोगों को सिनेमा हॉल तक पहुंचा दे। 25 साल पहले बिहार में बिहार की समस्या पर एक ऐसी ही फिल्म बनी थी, दामुल। उस जमाने में दो रचनाकारों की परिकल्पना मायावी परदे पर उतरी थी, लेकिन मायाजाल कहीं नहीं था। एक थे शैवाल जो अपनी लेखनी से एक साधारण-सी कहानी का फलक विस्‍तृत करते हुए एक गांव के प्लॉट में देश-दुनिया का सिस्टम बयान करने में लगे हुए थे तो दूसरे थे प्रकाश झा, जो बॉलीवुड के बने-बनाये तमाम फॉर्मूले को एक झटके में ध्वस्त कर रहे थे। बाजार को झुठलाकर एक नया फॉर्मूला गढ़ रहे थे। प्रकाश झा बिहारशरीफ दंगे पर एक डोक्यूमेंट्री फिल्म तथा हिप-हिप-हुर्रें जैसी फिल्म बना लेने के बाद भी बिहार में मजबूत कथानक की तलाश कर रहे थे। शैवाल और प्रकाश झा जैसे दो ठेठ समझ वाले रचनाकार मिले, तो ‘दामुल’ नाम से फिल्म बनी।
तकनीकी रूप से साल 1984 के आखिरी दिन यह फिल्म रीलीज हुई लेकिन व्यावहारिक तौर पर 1985 की फिल्म थी। बिहार के एक गांव की समस्या पर बनी इस फिल्म में पूरी हिंदी पट्टी ने अपने गांव की समस्या को तलाशना शुरू किया, देश भर के सिनेप्रेमी, समीक्षक और सिनेमा के पंडित हैरान रह गये कि भला ऐसी फिल्म भी बन सकती है और तब बड़े-बडे समीक्षकों ने सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा की कि हिंदी पट्टी की समस्या पर, हिंदी भाषा में, हिंदी वालों के द्वारा बनी यह भारत की पहली फिल्म है। फिल्म के कहानीकार शैवाल बताते हैं कि तब नेशनल फिल्म अवार्ड की बारी आयी तो अरविंदम की मलयालम फिल्म ‘मुखा मुखम’, सत्यजीत रे की ‘घरे बाहिरे’ और गौतम घोष की ‘पार’ जैसी फिल्मों को रेस में पछाड़कर ‘ दामुल’ ने अपनी जगह बनायी। लेकिन कहते हैं न कि वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है। रीतियां, नीतियां, पद्धतियां, प्रणालियां, महत्व, मान्यताएं… सब। प्रकाश झा भी बदले।

बकौल वरिष्‍ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज, प्रकाश झा की फिल्मों में अब वैसी राजनीतिक आवाज नहीं सुनाई पड़ती, जैसी कि दामुल में थी या उसके बाद मृत्युदंड में। जो दामुल को देखेगा, वह यह कहेगा कि प्रकाश झा की पकड़ बिहार के विषयों पर कमजोर हुई या फिर साहस में कमी आयी है। फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम कहते हैं कि ‘दामुल’ निश्चित तौर पर अपने समय की बेहतरीन फिल्म थी और एक लिहाज से हिंदी पट्टी की समस्या पर उस तरह की दूसरी फिल्म उस माहौल को दिखाते हुए नहीं बनी लेकिन अब इतने साल बाद उसके सिक्वल की गुंजाइश है और उसके रिमेकिंग की भी। दामुल एक इतिहास बन गया। अब नयी पीढ़ी के बीच प्रकाश झा की पहचान ‘अपहरण’, ‘राजनीति’ जैसी फिल्मों के माध्यम से है। नये नौजवान दामुल देखें तो रोम-रोम में सिहरन पैदा हो जाए कि क्या ऐसा भी होता था। लेकिन बिहार ने पिछले तीन दशक में कैसे करवट लिया है, इसे समझने के लिए लोक के बीच सबसे पॉपुलर विधा सिनेमा के जरिये यदि महसूसना हो तो ‘दामुल’ को देखा जा सकता है।
कहा जाता है कि बिहार की सामाजिक और राजनीतिक धारा जाति के खोल में बंधी रहती है। बिहार नक्सलियों के आंदोलन के कारण भी काफी चरचे में रहा। जातीय नरसंहार के लिए भी यहां की धरती काफी उर्वर रही। अब यह भी सुनने को मिलता है कि सब बीते दिनों की बात हुई। बिहार में विकास की राजनीति को अब मुख्यधारा की राजनीति माना जा रहा है। सच शायद बिल्‍कुल यही नहीं है। बिहार में कई ऐसे कोने हैं, जो आज भी सिसक रहे हैं। उस स्थिति की कल्पना से रोम-रोम में सिहरन पैदा हो सकती है। और यदि 25 साल पहले के बिहार के एक हिस्से को महसूसना हो तो इसे मुंहामुंही सुनने के बजाय जीवंत चित्रण के साथ एक फिल्म को देखकर समझा जा सकता है
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Posted on 06 Mar 2011 by Nirala

 

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