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Tribute | इयाद में

 

लोकरस के धार की असल सूत्रधार थीं वह

18 फरवरी 2006 का वह दिन याद आता है. उस रोज दुपहरिया का समय था. पटना के कंकड़बाग मोहल्ले के वकील साहब की हवेली में उनसे मिलने पहुंचा था.तब उम्र के 86वें साल में बिहार की स्वर कोकिला विंध्यवासिनी कई बीमारियों की जकड़न में थी. न ठीक से बैठने की स्थिति थी, न बोलने-बतियाने की ताकत. लेकिन बच्चों जैसी उमंग, उत्साह लिये सामने आयीं.

इज इट पॉसिबल फॉर एनी वन डीयर...?

तब कुलदीप हंसते हुए कहते, मरूंगा तो जरा गाजे-बाजे के साथ कलाकारी वाले अंदाज में ले जाना, जलाना मुझे... बिनू ने किया भी वैसा ही. बाजे के साथ उनकी अर्थी उठी और घाट तकजाने वाले थे कुल जमा दस लोग...यह भी अजब संयोग था कि मंजरवे की मौत की खबर सुन कर उस सवाल का जवाब भी मिल गया, जो मैंने अपने दोस्त से मैसेज के माध्यम से पूछा था-आई वांट टू लीव फुल्ली, सो आई कैन डाई हैप्पी... इज इट पॉसिबल फॉर एनी वन...?

मैं अपना दुख नहीं बेचता, फिर भी लोग भुना लेते हैं

वहां भोजपुरी फिल्‍मी कलाकारों के लटके-झटके में गोविंद दा कहां गुम हो गये थे, पता ही नहीं चला। वे बैठे रहे, एक कतार में। मूक दर्शक बन कर। सिनेमा में गांव, गांव का सोन्हापन, बोली, आंचलिकता और भोजपुरी परिवेश को एक अलग मुकाम पर ले जाने वाले गोविंद दा को उस फिल्‍म फेस्टिवल में उपेक्षित देख मन विचलित हुआ। अगले दिन बनारस के होटल में मिले तो उन्होंने हंसते हुए कहा कि अरे! पागल हो क्‍या? यही रवायत है फिल्‍मी दुनिया का। इसे समझ लोगे तो मन को कोई परेशानी नहीं होगी। मैं ठीक हूं, मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगता अब।

एहो देखीं जा

 

लोग मुझसे उम्मीद करते हैं, मैं भी बहक गयी तो..., posted on 06 Mar 2011 by Nirala

 

बिसेस: भिखारी ठाकुर के

भोजपुरी सिनेमा के 50 बरिस

चिठी-पतरी, आख्यान-व्याख्यान

नदिया के पार के 25 वर्ष

दामुल के 25 साल

25 Yrs of Damul

एगो ऐतिहासिक क्षण

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