SANS

Anam-Badnam | अनाम, गुमनाम, बदनाम

 

दिल दिया, जान दी और दे दी सारी कमाई...

अकथ कहानी प्रेम की
काल निगल गया एक प्रेम कथा को
इतिहास में गुमनाम ही हैं बाबू कुंवर सिंह की सहयोगी और बाद में दूसरी पत्नी बनीं धरमन

बत्तख मियां न होते तो 1917 में ही दुनिया से विदा हो जाते बापू

30 जनवरी को हम शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं. उसी रोज नथुराम गोड्से ने गांधी की हत्या कर दी थी. लेकिन गांधी की हत्या उनके शुरुआती दिनों में ही हो जाती, यदि बत्तख मियां न होते. आइये कुछ जानते हैं अपने माटी के गुमनाम नायक बत्तख मियां अंसारी की दास्तां-

गावेला बलेस्सर अजमगढ़ के, जे बाटे मुंहफूंकना रे सजनी....

मैं आजमगढ़ का रहनेवाला सामान्य सा एक बिरहा गायक हूं. अपनी गायकी को लेकर कभी द्वंद्व में नहीं रहता, ना रहना चाहता हूं कि नवरात्रा आये तो जरा माई का भजन गाकर भी खुद को लोकप्रिय कर लूं, सावन का महीना आये तो जरा बम भोले के गीतों पर भी सुर लगा लूं और जब होली आये तो साया-चोली का बाजूबंद खोलने में लग जाउं. मैं वही गाता हूं, जो सच है. सच यही है कि लोक का मिजाज यथार्थ में जीता है, वह अपने जीवन की सच्चाई को, जीवन की मस्ती को, जीवन की आकांक्षा को लोकगीतों में तलाशता है.

एहो देखीं जा

 

लोग मुझसे उम्मीद करते हैं, मैं भी बहक गयी तो...
प्रसिद्ध लोकगायिका पद्मश्री शारदा सिन्हा से निराला की खास बात-मुलाकात


न कोई बड़ी-बड़ी बातें, न श्रेष्ठताबोध से ग्रसित वाक्य. गीत-संगीत की भाषा में ही सबकुछ बताना चाहती हैं शारदा. किसी गीत के बारे में जानने के लिए सवाल कीजिए तो वह गाकर सुनाएंगीं. माथे पर बड़ी लाल बिंदी, होठों पर गहरी लाल रंग की लिपस्टिक और मुंह में पान, इसी रंग में रहती हैं शारदा. चाहे घर पर हों या देश-परदेश के किसी कोने में. खाली कभी नहीं बैठना चाहतीं. खाली समय में घर का काम वैसे ही करती हैं, जैसे कोई और घरेलू महिला. मेहमानों को खुद चाय बनाकर देती हैं.खाली समय रहा तो उनका मनपसंद काम है किसी से कुछ नयी चीज जानना-समझना.और कुछ नही ंतो अपने घर की नौकरानी से ही आदिवासी गीत सुनती हैं. इधर-उधर फोन कर सेटिंग-गेटिंग की बजाय गांव घर में फोन मिलाती हैं और सबको एक ही एसाइनमेंट देती हैं- कुछ पुराने गीत मिलें गांव-घर के तो जरूर बताइयेगा. शारदा से मिलते वक्त, उनसे बात करते वक्त कभी नहीं लगेगा कि आप उस गायिका से मिल रहे हैं, बात कर रहे हैं, जिसको देखने-सुनने के लिए हजारों की भीड़ घंटों खड़ी रहती है. रोज-ब-रोज ही लोकसंगीत के कार्यक्रम आजकल होते रहते हैं लेकिन शारदा हर जगह जाना पसंद नहीं करतीं. उन्हें बुलाने के लिए भी नैतिक साहस चाहिए होता है. जाने से पहले हजार बार सोचना पड़ता है आयोजकों को. लेकिन कम कार्यक्रमों में जाकर भी वे किसी भी कलाकार से ज्यादा दिलों पर राज करती हैं. जुबान पर छायी रहती हैं. लोकमानस में रची-बसी शारदा सिन्हा से काफी समय बाद पिछले दिनों लंबी बात-मुलाकात हुई. पेश है चुनिंदा अंश ं-







कुछ निजी, अनछुए, अनदेखे प्रसंग

- लखनउू में वह पहला आॅडिशन टेस्ट, रिजेक्ट हो गयी, गुस्से में गला खराब करने के लिए जमकर कुल्फी खायी, लेकिन...

क्लासिकल गीत-संगीत में रुचि तो थी ही. संगीत से प्रभाकर कर रही थी. मणिपुरी नृत्य का प्रशिक्षण भी ले रही थी. इसी बीच मेरी शादी डाॅ बीके सिन्हा से हो गयी. शादी के बाद हम समस्तीपुर में थे. तब गु्रप के कुछ हमउम्र साथी मिलकर दिन-रात गाना गाने की जुगत में लगे रहते थे. अखबार में एक इश्तेहार आया कि लखनउू में टैलेंट सर्च चल रहा है. हमने अपने पति बीके सिन्हा से बात की तो वे चलने को तैयार हो गये. यह 1971 की बात है. पैसे हमारे पार पर्याप्त थे नहीं फिर भी हम लखनउ के लिए निकल गये. वहां ट्रेन से उतरकर सीधे एचएमवी कंपनी के आॅडिशन सेंटर पर पहुंचे. काफी भींड़ थी. जहीर अहमद रिकाॅर्डिंग इंचार्ज थे जबकि मुकेश साहब के रामायण एलबम में संगीत देनेवाले मुरली मनोहर स्वरूप संगीत निर्देशक. नेक्स्ट-नेक्स्ट कर प्रतिभागियों को बुलाया जा रहा था. आखिरी में मैं पहुंची और जाकर बोली कि गाना गाउंगी. जहीर अहमद ने मेरी आवाज में यह एक वाक्य सुनते ही कहा कि नहीं जाओ, तेरी आवाज ठीक नहीं है. एक सीरे से खारिज कर दी गयी. समस्तीपुर से भागे-भागे लखनउू पहुंची थी मैं, बेहद निराश हो गयी. सोच ली कि जब रिजेक्ट ही कर दी गयी मेरी आवाज तो अब कभी नहीं गाउंगी. उस रोज लखनउु अमीनाबाद पहुंचकर जितना कुल्फी खा सकती थी, खायी. मैं अपने आवाज को एकदम से बिगाड़ देने की जिद के साथ कुल्फी खाये जा रही थी कि अब तो गाना ही नहीं है. रात में हम एक होटल में रूके. बीके सिन्हा ने कहा कि एक बार और बात करेंगे, ऐसे कैसे लौट कर चले जायेंगे. खैर! तय हुआ कि सुबह चलेंगे मिलने.अगली सुबह हम फिर बर्लिंगटन होटल के कमरा नंबर 11 में बने एचएमवी के टेंपोररी स्टूडियो में पहुंचे. इस बार मेरे पति बीके सिन्हा ने संगीत निर्देशक मुरली मनोहर स्वरूप से अनुरोध किया कि मेरी पत्नी गाना गाती हैं, पांच मिनट का समय दे दीजिए. मुरली मनोहर जी तैयार हो गये. माइक पर पहुंची तो ढोलक पर संगत कर रहे अजीम ने मजाक करते हुए कहा कि शारदा कल तो चल नहीं पायी थी, आज शुरू करने से पहले जरा दस पैसा माइक पर चढ़ा दो ताकि नेग बन जाये. सामने देखी तो आॅडिशन लेने के लिए कोई महिला बैठी हुई थी. मैं क्या गाउं, यह तय नहीं कर पा रही थी. लोक संगीत के नाम पर मुझे दो गीत याद थे, जो अपनी भौजाई से सीखी थी अपने दूसरे भाई की शादी में गाने के लिए. एक द्वार छेंकाई का गीत सीखी थी ताकि भाई के शादी में द्वार छेंकूंगी तो कुछ पैसे मिलेंगे और दूसरा गीत कन्यादान का था. मैं वही गीत गाना शुरू की- द्वार के छेंकाई एक दुलरूआ भइया, तब जइहो कोहबर पर... जब मैं इस गीत को गा रही थी, तब तक एचएमवी के जीएम केके दुबे भी वहां पहुंच चुके थे. गीत खत्म होते ही केके दुबे ने कहा- मस्ट रिकाॅर्ड दिस आर्टिस्ट. और वह महिला जो, आॅडिशन जज के रूप में बैठी हुई थी, पास बुलाकर सर पर हाथ फेरते हुए बोली- बहुत आगे जाओगी, बस रेयाज किया करो. मुझे बाद में पता चला िकवह महिला कोई और नहीं बल्कि बेगम अख्तर थीं, जिनकी आज मैं सबसे बड़ी फैन हूं. मेरे गीत रिकाॅर्ड हो गये.

- मेरी शादी हुई, नैहर से विदा हो रही थी तो बाबूजी ने कहा- एक टा गीत सुना दो बेटा शारदा, तब जाओ...

बात 1970 की है. मेरी शादी हुई. मेरी विदाई होने लगी. मेरे संगीत के गुरुजी रामचंद्र झा समेत कई लोग, सभी परिजन विदाई के वक्त मौजूद थे. विदा होने से पहले मेरे पिताजी ने घर के अंदर मौजूद सभी पुरुष सदस्यों को ओसारे में चलने के लिए कहा. मेरे पति को भी पिताजी ने कहा कि मेहमान आप भी कुछ देर बाहर बैठें. उसके बाद उन्होंने धीरे से कहा कि जा ही रही हो शारदा तो एक टा गीत सुनाती जाओ. मैं बैठ गयी. पिताजी के दो मनपसंद गीत गाने लगी. पहले सुनायी- घूंघट नैना नाचे, पनघट-पनघटन नैना, लहर-लहर नइया नाचे, नइया में खेवइया... और दूसरा गीत था- निमिया तले डोला रख दे मुसाफिर... मैं गा नहीं पा रही थी, खुद को संभाल नहीं पा रही थी. पिताजी ने गले से लगा लिया. वहां मौजूद सारे लोग रो रहे थे. ऐसे ही माहौल में मैं अपने पिता के घर से विदा हुई. अभी जब कुछ वर्षों पहले मेरी बेटी की शादी हो रही थी तो मैं उस दिन को याद कर रही थी. बेटी की शादी में मैंने अपने ससुराल व मायके से अड़ोस-पड़ोस के सारे लोगों को बुलाया था. काफी संख्या में महिलाएं आयी थीं. सब गीत गा रही थी, मैं काम में लगी हुई थी. बार-बार उधर ही पहुंच जा रही थी, जिधर गीत काने का कार्यक्रम चल रहा था. बार-बार मन करता रहा कि एक गीत तो गा ही दूं लेकिन काम की अधिकता के कारण यह मुराद पूरी न कर सकी.

- सबसे यादगार प्रोग्रामः अपने ससुराल में जब अपनी शारदा बहुरिया को देखने-सुनने के लिए लाखों की भीड़ घंटों सड़क किनारे जमी रही

मेरी शादी बेगुसराय जिले के सिहमा गांव में हुई है. इस नाते मैं बेगुसराय वाले मुझे बहुरिया कहते हैं. वर्षों पहले की बात है. इलाके के कुछ नामी-गिरामी बदनाम-कुख्यात लोगों ने मिलकर एक धार्मिक यज्ञ का आयोजन किया. इलाके में यही हल्ला था कि वे लोग अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए यज्ञ का आयोजन कर रहे हैं. तब बात आयी िकइस यज्ञ की पूर्णाहुति कैसे हो? अधिकतर लोगों ने कहा कि- आपन पतोह छतीन शारदा सिन्हा, उन्हीं से. मुझे यज्ञ के आखिरी दिन बेगुसराय मंे बुलाया गया. मैं समस्तीपुर से चली तो बछवारा से बेगुसराय तक सड़क के दोनों ओर लोग जमे हुए थे. स्वागत में. लोगों ने बताया कि कम से कम पांच लाख लोग तो थे ही. दूर-दूर तक लगे माइक से गीत सुनने के लिए. मैंने अपने जीवन में कभी एक कलाकार को सुनने के लिए उस तरही की भीड़ कभी नहीं देखी. वह प्यार, वह धैर्य और उतनी बड़ी भीड़ में बहू का मान-सम्मान रखने के लिए अनुशासन बनाये रखना, कभी नहीं भूल सकती. जगदंबा घर में दियरा बार अईनी हे...गीत काफी मशहूर हो चुका था. सड़क किनारे लोग एक ही नारा लगा रहे थे- जगदंबा माई की जय.

- आह! वह माॅरिशस यात्रा, वाह! माॅरिशस की वह यात्रा.

माॅरिशस की यात्रा दो मायनों में मेरे लिए यादगार है. पहली बार बिहार से किसी सांस्कृतिक दल को
माॅरिशस जाने की बात सामने आयी. मैंने भी इच्छा जतायी तो कहा गया कि पहले आपका आॅडिशन टेस्ट होगा. यह जानकर हैरत में पड़ गयी कि आॅडिशन टेस्ट कौन लेगा तो बिहार की एक मंत्री कृष्णा शाही. मैं मना कर दी कि मुझे नहीं जाना माॅरिशस. विदेश जाने के लिए किसी के पास जाकर आॅडिशन तो नहीं ही दे सकती थी और फिर आॅडिशन की जरूरत क्या थी, बिहार की कौन-सी ऐसी गली थी, जहां लोग शारदा सिन्हा को छठ गीत के रूप में नहीं सुन रहे थे, विवाह गीत नहीं बजा रहे थे. मैं मना करते हुए यही कही थी कि अब जब खुद बुलाया जाएगा तभी जाउंगी कहीं. मेरे मना करने पर किसी ने लिखा भी कौआ चला था कोयल की व्वायस टेस्ट लेने. दो साल बाद भारत के राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा का बुलावा आया. मैं उस वक्त मुंबई में ‘मैंने प्यार किया’ फिल्म के गीत को रिकार्ड करने गयी थी. फोन गया कि राष्ट्रपति जी आपको साथ में लेकर माॅरिशस जाना चाहते हैं. माॅरिशस की तैयारी हुई. वहां एयरपोर्ट पर उतरते ही सबसे पहले डाॅ शंकरदयाल शर्मा से सबसे पहले प्रेसवालों का यही सवाल था कि शारदा सिन्हा आयी है कि नहीं. वहां एयरपोर्ट पर मैं एक कार में बैठी. कार में ‘ पनिया के जहाज से पलटनिया बनी अईह...’ गीत बज रहा था. सड़क किनारे और कई दुकानों पर भी यही गीत बज रहे थे. मैं सोच में पड़ गयी कि इस गीत के इतने सारे डिस्क यहां कैसे आ गये. ड्राइवर से जानना चाही कि क्या डिस्क बजा रहे हो. सभी जगह यही गीत कैसे बज रहे हैं. ड्राइवर न हिंदी जानता था, न इंग्लिश. वह सिर्फ क्रेयोल जानता था. कुछ नहीं समझ पा रहा था. रास्ते में मैंने गाड़ी रुकवाई. एक लड़की साइकिल से जा रही थी. वह इंग्लिश समझती थी. उससे पूछी कि यह गीत कैसे बज रहे हैं सभी जगह, क्या डिस्क बज रहा है. तो वह लड़की बोली कि नहीं यह एमबीसी है यानी माॅरिशस ब्राॅडकास्टिंग कारपोरेशन और यह जो गीत सुन रही हैं, वह शारदा सिन्हा की है. मस्त गाती हैं. आज आ रही हैं यहां. आना हो तो आइये, आज उनका प्रोग्राम होगा, मजा आयेगा.

- पति पान खाते थे तो झुंझला जाती थी कि किसके फेरे में पड़ गयी, यह पान तो सौत बन गया है और अब मैं पान के बिना नहीं रह पाती

मेरी शादी हुई. मैं ससुराल आयी. पति पान खानेवाले मिले. दिन भर पान चबाते रहते थे. जब इनके साथ कहीं-कहीं आना-जाना होता था तो वे रास्तें कई जगह रिक्शे को रूकवाते कि जरा पान खाकर आते हैं. मैं उकता जाती थी कि क्या जवाल है यह, कभी चैन से नहीं रहने देता. घर में मैं कभी-कभी कहती कि मैं भी खाकर देखूं तो सिन्हाजी यानि मेरे पति मना करते और कह देते कि इसका खाइयेगा भी नहीं, मैं जो पान के साथ खाता हूं, वह चूहामार दवाई है. मैं सोचती कि इनको जब चूहामार दवाई से कोई फर्क नहीं पड़ता तो मुझे क्या हो जाएगा. एक रोज चुपके से सिन्हाजी का रखा हुआ पान खा ली. थोड़े ही देर में सारी दुनिया घूम रही थी. उलटी करते-करते मेरी हालत खराब हो गयी. सिन्हाजी आये तो कहने लगे कि इसीलिए मैं मना करता था. मैं बोली कि मैं तो चूहामार दवा टेस्ट कर रही थी. फिर उसके बाद जमशेदपुर प्रोग्राम में जा रही थी तो मैंने स्टेशन पर उतरते ही सिन्हाजी से कहा कि पहले एक पान खायेंगे, तब कहीं जायेंगे. धीरे-धीरे पान खाने की आदत पड़ी और अब तो सुबह जगने से लेकर रात में सोने तक पान के बगैर रह ही नहीं पाती. लोग कहते हैं कि इतना पान न खाया कीजिए, कैंसर होता है. मैं कहती हूं कि अब कैंसर हो या कुछ और, पान के बगैर कैसे रहूं. सिन्हाजी से प्रतियोगिता चलती है कि कौन कितना ज्यादा पान खाया.

- देहरादून का वह आयोजन. हबीब तनवीर साहब की महानता, उनका प्यार, कभी नहीं भूल सकती

मुझे याद है. मैं देहरादून गयी थी. ‘विरासत’ नामक आयोजन में भाग लेने. काफी सीनियर कलाकारों का जुटान हुआ था. गंभीर गीत-संगीत चल रहा था. मेरी बारी आयी. मैं भोजपुरी गीत गायी- नजरिया हो हमरी ओर रखियो. कोठा उठवले, कोठरिया उठवले, खिड़िकिया हो हमरी ओर रखियो...’ प्रोग्राम खत्म होने के बाद हबीब तनवीर साहब नीचे दर्शक दीर्घा से खुद चले आ रहे थे स्टेज की ओर. किसी ने बताया कि हबीब साहब मिलना चाहते हैं, लेकिन चलने में उन्हें परेशानी है. मैं भागे-भागे जाने लगी नीचे, वे स्टेज तक आ चुके थे. उन्होंने माथे पर हाथ फेरा, कहा शारदा, तबीयत खुश हो गयी. मैं मिलना चाहता था आपसे. आप भोपाल जरूर आओ. फिर मैं अगले साल भोपाल गयी. हिंदी दिवस के एक आयोजन में. विद्यापति के गीतों को सुनायी. हबीब साहब मौजूद थे. तय हुआ कि अगले कार्यक्रम में मैं ‘जयदेव’ की रचनाएं सुनाउंगी. हबीब साहब नहीं रहे. उनके जैसा सहज कलाकार, उनका प्यार... हमेशा याद आते हैं हबीब साहब.

- मुंबई का वह कार्यक्रम, ‘ मैंने प्यार किया’ का वह अनुभव और शाम को बड़जात्या परिवार के साथ बांटे हुए वे क्षण.

मुंबई के एक आयोजन में मैं गयी थी. एक गीत सुनायी थी- कुछुओ ना बोलब, चाहे कउनो सजा द, कईनी कसूर कवन, एतने बता द... बाद में मुंबई से राजश्री प्रोडक्शन से फोन आया कि हमलोग ‘ मैंने प्यार किया’ नाम से एक फिल्म बना रहे हैं. आप जो गीत गायी थी, उसी तर्ज पर, कुछ बदलाव के साथ. गीत रिकाॅर्ड हुआ- कहे तोसे सजना, तोहरी सजनिया... यह मेरा सबसे पसंदीदा गीत है, जिसे मैं अब भी गुनगुनाती हूं. होली के वक्त मुंबई में रिकार्डिंग हुई थी. अब वापस पटना आने की गुंजाइश नहीं थी. मुंबई के होटल में होली का वक्त काटने को दौड़ रहा था. ताराचंद बड़जात्या जी का अनुरोध आया कि शाम को वे अपने घर पर बुला रहे हैं. मैं पहंुची. उन्होंने कहा कि आज की होली आपके नाम है. आप सिर्फ वह गीत सुना दो एक बार- निमिया तले डोला रख दो मुसाफिर, सावन की आयी बहार रे.... बाद में बड़जात्या परिवार से संबंध मधुर हुए. सूरज बड़जात्या आज भी पत्र लिखते हैं तो बिहारी मां कहकर ही संबोधित करते हैं.
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इंटरव्यू

सवालः- नया क्या हो रहा है इन दिनों?
जवाब- नया क्या, मेरे जेहन में तो हमेशा पुराना ही चलते रहता है. गीतों की तलाश में लगी रहती हूं. पारंपरिक, ठेठ लोकगीत मिल जाये, तो उसे गाकर, अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित कर जाउं. नये में ज्यादा रुचि नहीं.

सवालः- नया तो बहुत कुछ हो रहा है. लोकगीतों में टैलेंट हंट प्रोग्राम, अलबमों की भरमार, भोजपुरी फिल्मेां का अंधाधुंध निर्माण. आप इन सबमें कहां हैं?
जवाब- टैलेंट हंट में जो बच्चे आ रहे हैं, उनमें काफी संभावनाएं दिखती हैं. बस, वे एक चीज से बचे तो बेहतर. नकल कर सिर्फ गीतों को गाकर गायक बनने का ख्वाब न रखे, फटाफट फाॅर्मूले में विश्वास न करे. यह तुरंत सफलता तो दिला भी दे लेकिन अंततः खारिज कर दिये जायेंगे. रियाज करें, धैर्य रखें और जो गायें, उसे निजी जीवन में निभायें भी. रही बात अंधाधंुध एलबम निर्माण की तो मैं कभी रेस में नहीं रहती. अपनी शर्तों पर काम करती हूं. सिर्फ बाजार में बने रहने के लिए कुछ भी नहीं गा सकती. सिर्फ पैसे के लिए मशीन की तरह गीतों की बौछार नहीं कर सकती. गीत मेरे मनमुताबिक होने चाहिए. समाज ने मुझे जिम्मेवारी दी है, लोग मुझसे उम्मीद करते हैं, मैं भी बहक गयी तो... और फिर यह जो भोजपुरी फिल्मों का दौर है, उससे तो मैं रिदम ही नहीं बिठा पाती. अभी एक ‘देसवा’ फिल्म आ रही है, उसमें गीत गायी हूं. बीच में एक और फिल्म में गायी थी.

सवालः लोक संगीत, विशेषकर हिंदी पट्टी के लोकसंगीत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
जवाबः- मैं तो डरती हूं कि अभी जो हो रहा है, कहीं वही मुख्यधारा न बन जाये. गीतकार, बाजार, गायक कलाकार और श्रोता, सब लोकसंगीत को हाईवे सौंग बनाने पर आमादा हैं. सरोकार खत्म हो रहे हैं.

सवालः लोकसंगीत, विशेषकर भोजपुरी लोकसंगीत को अश्लिलता का पर्याय बना देने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेवार किये माना जाये.
जवाब- जिम्मेवार तो कलाकार,बाजार,गीतकार, श्रोता सभी हैं. कुछ गीतकारों की हालत ऐसी है िकवे गांव-जवार के पारंपरिक लोकगीतों को भी अपने नाम से कर लेते हैं और कहते हैं कि यह गीत मेरे हैं. चैर्य कला में माहिर हो गये हैं. या फिर ऐसी गीतों को रचते हैं, जिसमें सब कुछ एक माल की तरह हो जाता है. दूसरी ओर कंपनियों का भी दबाव रहता है िकवे कुछ ऐसा ही गाये, जो रातो-रात, चाहे जिस वजह से हो, चरचे में आ जाये. नये गायकों को समझाती हूं कि क्यों ऐसे उलुल-जुलुल गीत गाते हो तो उनका कहना होता है कि पेट का सवाल है. और फिर रही बात श्रोताओं की तो वे कभी रिएक्ट ही नहीं करते, इसलिए यह सब चल रहा है.

सवालः हिंदी फिल्मों में तो अब लोकगीतों को खासा तवज्जो दिया जा रहा है. बिहार के लोकगीत क्यों नहीं जा पा रहे.
जवाब- लोकगीतों को तो हमेशा ही तवज्जो दिया जाता रहा है. अमर गीत तो वही हुए हैं, जिनमें शास्त्रीयता है या लोक धुनों की छौंक. अब इधर अगर बिहार के लोकगीतों को बाॅलीवुड फिल्मों में तवज्जो नहीं मिल पा रहा तो यह हमारी कमजोरी है. हमारे गीतकारों को चाहिए िकवे यहां की मौलिक चीजों को वहां पेश करे. बिहार में तो एक-से-एक गीत हैं, जो गांव में गाये जाते हैं, चरवाहे गाते हैं. लेकिन विडंबना तो यही है न कि जिसमें निजी फायदा न हो, अपना नाम न हो, उसके लिए क्या परेशां होना.

सवालः- आप जन्मीं झारखंड यानी रांची में, मूलतः हैं मैथिली और पहचान बनी भोजपुरी के कारण. ज्यादा करीब कहां पाती हैं.
जवाब- गीत-संगीत के स्तर पर तो सबके करीब लेकिन आत्मीय रूप से ज्यादा करीब झारखंड के. मैं अपने घर में सहयोगी के रूप में झारखंड के लड़कियों को ही रखती हूं. उनके साथ रहना, उनसे बोलना-बतियाना शुकून देता है. जन्मभूमि से जुड़े रहने का अहसास. मैं कभी यह कोशिश भी नहीं करती िकवे नागपुरी बोलती हैं तो मेरे से हिंदी में बोले. मैं भी उनसे नागपुरी सीख चुकी हूं, उसी भाषा में बात करती हूं. खाली समय में उनसे नागपुरी गीत सुनती हूं, सीखती हूं, फिर गाने की कोशिश करती हूं. मुझे आदिवासी जीवन सबसे ज्यादा पसंद है. कोई छल, कपट नहीं, एक निश्छलता है उनके जीवन पद्धति में.

सवालः- सीखने की प्रक्रिया अब भी जारी है!
जवाब- इस मामले में मैं बच्चे से बच्चा हूं. जब शादी होकर ससुराल आयी तो सास कहने लगी कि क्या करती है गाती फिरती है. बाद में सास ही गीतों को खोज-खोजकर देती थी कि सुन तो यह गीत मेरी दादी सुनाया करती थी, तुम गा सकती हो तो गाओ. शोभा गुरटू मुझे बेहद पसंद हैं. मेरी इच्छा थी कि उनसे कुछ जानूं-समझूं. उनके साथ कार्यक्रम भी किया लेकिन कायदे से मुलाकात नहीं हो सकी. आकर फोन की कि मैं मिलना चाहती हूं, आपसे कुछ सिखना चाहती हूं. शोभाजी बोलीं- शारदा मैं पाकिस्तान जा रही हूं, आती हूं तो मिलना. फिर बात नहीं हो सकी.

सवालः और कोई हसरत, जो गीत-संगीत जगत में आप पूरी न कर सकी?
जवाब- बचपन से ही, जब मैं गायकी नहीं करती थी, हिंदी फिल्मांे के गीत में लता मंगेशकर को सुनती रही हूं. पढ़ने के समय में कितने खत मैंने लताजी को लिखे है, मुझे खुद याद नहीं. रोज ही लिखकर भेजती थी. पता नहीं उनको वह खत मिले भी या नहीं. जब कभी मुलाकात होगी तो पता चलेगा.
सवालः- और कोई ख्वाब, जो आप पूरा करना चाहती हों.
जवाब- चाहती हूं कि एक संगीत संस्थान की स्थापना हो, जहां आज के बच्चों को ही दिशा में प्रशिक्षण दे सकूं. वहां से निकलने वाले बच्चे अपनी माटी से जुड़े रहें. वह बहकाव में आकर संगीत की मूल आत्मा को ही बर्बाद न करें बल्कि शास्त्रीयता और लोकपरंपरा का असली मतलब समझें और भविष्य में इसे बचाने, बनाने, बढ़ाने का काम करें. यह एक ख्वाब है, जिसे इसी जनम में पूरा करना चाहती हूं.

सवाल- आपको बिहार कोकिला, बिहार की लता मंगेशकर, मिथिला की बेगम अख्तर, बिहार की सांस्कृतिक प्रहरी, लोक कोयल आदि-आदि कई उप नामों से संबोधित किया जाता है. कई-कई सम्मान मिले हैं. आपको इनमें सबसे ज्यादा क्या पसंद है?
जवाब- हर सम्मान, उपनाम के साथ जिम्मेवारियां बढ़ती जाती है. आपको कोई सांस्कृतिक पहरुआ कहता है तो आपको हर पल सचेत रहना पड़ता है. यह सब जो सम्मान मिले हैं, वे मेरे लिए समाज की ओर से दी गयी जिम्मेवारी के तौर पर है. वैसे पश्चिम बंगाल के कुल्टी मंे साहित्यकार संजीव जो अब हंस के संपादक हैं, उन्होंने 1986 में जो एक सम्मान पत्र मुझे अपने हाथों से लिखकर दिया था, वह मुझे सबसे ज्यादा पसंद है.

सवालः- धर्मवीर भारती जी भी तो आपको बहुत मानते थे.
जवाब- वह तो मेरे बड़े भाई थे. जब भी खत लिखते थे तो प्रिय शारदा, आदरणीय शारदा का संबोधन रहता था. मैं नाराज हुई तो उन्होंने समझाया कि प्रिय इसलिए कि तुम मेरी प्रिय बहन हो और आदरणीय इसलिए कि तुम जो गाती हो, कर रही हो वह समाज में आदर देने योग्य है. धर्मवीर भारती का स्नेह मेरे निजी जीवन में अमूल्य थांती की तरह है.

सवालः आपको सारे लोग सुनते हैं. आप किनको सुनना पसंद करती हैं.
जवाबः- रसीद अली खान मुझे बेहद पसंद हैं. पंडित हरि प्रसाद चैरसिया को सुनती हूं. बड़े गुलाम अली खां साहब, बेगम अख्तर मेरे प्रिय कलाकार हैं. लता जी को सुनती हूं, गुलाबबाई की गायकी अदा पर फिदा हूं.

सवालः- एक आखिरी सवाल. आपको इस बार निर्वाचन आयोग ने बिहार चुनाव में ब्रांड एंबेसडर बनाया है. कहा गया कि शारदाजी ही ऐसी हैं, जिनकी अपील पूरे बिहार में कारगर होगी, कभी किसी विवाद में नहीं रही. शासन या सरकारों से कभी कोई शिकायत.
जवाब- यह मेरे लिए सम्मान की बात है कि निर्वाचन आयोग को यह भरोसा हुआ कि मेरी अपील बिहार में हर जगह सुनी जा सकती है, उसका असर पड़ेगा. शासन या सरकारों से एक शिकायत है कि जब भी कोई कला-संस्कृति की गतिविधि हो, संस्थान बने तो उसकी जिम्मेवारी वैसे लोगों के हाथों में ही दी जाये, जिनको इन चीजों की समझ हो. राजनीति से इसे कचरा न बनाया जाये. और एक मजेदार बात बताउं, शारदा सिन्हा का रिकोगनिशन हर जगह हो चुका है, सिर्फ अपने बिहार के उस काॅलेज में छोड़कर जहां मैं प्राध्यापक हूं. वहां अब तक मैं कनफर्म स्टाफ नहीं बन सकी हूं. मुझे तो हंसी आती है, दुख भी होता है कि रिकोगनिशन कमेटी के फेरे में तीन दशक से नौकरी कर रही हूं लेकिन रिकोगनाइज नहीं हो सकी.
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Posted on 06 Mar 2011 by Nirala

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