SANS

Anam-Badnam | अनाम, गुमनाम, बदनाम

 

गावेला बलेस्सर अजमगढ़ के, जे बाटे मुंहफूंकना रे सजनी....

निराला
मुन्नी के बदनाम होने और झंडू बाम होने पर ठुमके लगते तो कई दिनों से शादी-ब्याह में या राह चलते देख-सुन ही रहा था, दो-ढाई माह पहले रांची से पटना की बस यात्रा में मुन्नी को बदनामी और झंडू बामी स्टाईल में देखने का भी मौका मिला. रांची से पटना की यात्रा डुप्लीकेट वोल्वो बस से कर रहा था. कई वजहों से उसे डूप्लीकेट वोल्वो कहा जाता है. एक प्रमुख वजह यह कि उसमें एसी के नाम पर सामान्य बसों से ज्यादा किराया लिया जाता है लेकिन बस चलने के बाद पूरी यात्रा एसी बंद कर तेल बचाने का गुणा-गणित लगाते हुए ड्राइवर इस कदर ठंडई मार स्टाइल में एसी चलता है कि पैसेंजरों को थोड़े ही देर में काठ मारने लगता है. फिर क्या, परेशान होकर पैसेंजर ‘बंद करो एसी-एसिया बंद करो रे... मुआएगा...’ की चिल्लाहट लिये ड्राइवर के पास पहुंचने लगते हैं. और फिर खलासी एक साथ सबको संदेशा सुना देता है कि ‘‘ आपलोग भी न, समझिये में नहीं आता है. अब इ नहीं कहियेगा कि एसी का भाड़ा लेके एसी नहीं चलायें, ओइसे खिड़की भी इसका खुलता है, वोल्वो जइसा नहीं है कि पैक है तो पैके रहेगा, चाहें तो खोल सकते हैं. खैर! बस यात्रा का बखान फिर कभी. पहले बदनाम मुन्नी को देखने और एक गीत का मुखड़ा सुना देने भर का दंश साझा करते हैं. मलाइका अरोड़ा खान मुन्नी बदनाम हुई पर जब ठुमका लगा रही थी तो गजब की मस्ती और आनंद में डूबे हुए थे लोग. कुछेक परिवार के साथ थे. अपने यहां परिवार की नयी परिभाषा चलन में है कि आप सपत्निक हों. और बाल बच्चे हों तो संपूर्ण परिवार. सपिरवार, सानंद मुन्नी छाप गीत सुनने के बाद ही संयोग से डीवीडी फंस गया. दबंग का शो बीच में ही बंद हुआ. मेरे साथ यात्रा कर रहे एक मित्र ने सोचा कि जरा आनंद को और बढ़ा दिया जाये, जब इतने आनंद से लोग सुन ही रहे हैं तो क्यों न कुछ और हो जाये. उसने अपने मोबाइल में फूल वोल्यूम कर ‘ निक लागे टिकुलिया गोरखपुर के...’ का सुर सधवा दिया. सपरिवार बैठे हुए एक सज्जन उठे. सीट तक आये और जोर से बोले, जरा भी तमीज नहीं है? शर्म नहीं आ रही, यहां परिवार के साथ लोग चल रहे हैं और तुमलोग बलेस्सरा को बजा रहे हो...! सच में, एक जरा भी गुस्सा नहीं आया उन पर, न तुम-ताम करने से, न नैतिकता का पाठ पढ़ाने से. मेरे साथी ने धीरे से टुनकी मारी- अरे मुन्निया बदनाम हो रही थी तो परिवार को आपत्ति नहीं थी, परिवार का खयाल नहीं था... इस टुनकी के बाद एक और सलाह सार्वजनिक तौर पर देते हुए वे अपने सीट तक गये कि पता नहीं अब आलतू-फालतू, चिरकुट लोग भी इ सब बस पर भी चलने लगा है. कउनो जगहे सेफ नहीं है. इस बार पिछले सीट से जवाब आया- अरे भाई, डुप्लीेकेट वोल्वो है तो कईसन आदमी खोज रहे हैं. ननडिस्टर्बिंग एलीमेंट 500 रुपइया ओला असली वोल्वो में जाते हैं. फिर पीछे सीट वाले उस यात्री ने कहा कि बजाइये जरा एक बार फिर बलेस्सर को...
दो-ढाई माह पहले का यह वाकया कल सुबह से बार-बार याद आ रहा है. परसो रात नौ बजे के बाद से ही बीएसएनएल मोबाइल फोन का नेटवर्क डिस्टर्ब चल रहा था. फोन का आना-जाना ठप था. सुबह जगते ही मोबाइल के मैसेज बाॅक्स में एक मैसेज पड़ा मिला- बालेश्वर तो नहीं रहे गुरू. बनारस से आये इस मैसेज को देखते ही मुझे बस यात्रा में सपरिवार चल रहे उन सज्जन का बलेस्सर की आवाज से भड़कना, दो साल पहले लखनउ में बलेस्सर से हुई मुलाकात और भोजपुरी समाज के सभ्य लोकरसियों का छद्म आवरण, एनडीटीवी इमेजिन तथा महुआ के एक कार्यक्रम की भी यादें ताजा हो गयी.
होश संभालने के बाद से ही जिस एक गायक को घरवालों से बच-बचाकर सुनने की मजबूरी रही थी, वह गायक बलेस्सर ही थे. बलेस्सर हमारे सभ्य भोजपुरी समाज के प्रतिबंधित गायक थे, जिन्हें सुनकर बच्चों के बिगड़ जाने की गुंजाइश रहती थी, परिवार और समाज का वातावरण बिगड़ जाने का भ्रम भी रहता था इसलिए उन्हें सुनने नहीं दिया जाता था. मोटका मुंगड़वा का होई..., तीन बजे आके जगइहे पतरकी सुतल रहब खरिहानी में... जैसे गीतों को गाने के बाद अश्लीलता के पर्याय माने जाने लगे थे बलेस्सर. बलेस्स्र सम-सामयिक चुनौतियों पर, मसलों पर गीत गाते रहे लेकिन कुंठित सेक्स को बढ़ावा देनेवाले गायक के रूप में स्थापित कर दिये गयेे. लेकिन अपनी पूरी जिंदगी में उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की.वह अपने एक गीत का मुखड़ा हमेशा सुनाया करते थे- बलेस्सर मुंहफूंकना रे सजनी... बताया जाता है कि बलेस्सर को कई बार सार्वजनिक मंचों पर दुत्कारा गया लेकिन बलेस्सर ने कभी उसकी परवाह नहीं की. एक दफा की बात है कि जब रांची के मेकाॅन हाॅल में वे 70 या 80 के दशक में एक कार्यक्रम देने पहुंचे थे तो उन्हें गालियां दे-देकर मंच से उतार दिया गया था. इसी तरह एक दफा दिल्ली में कोई भोजपुरी सम्मेलन हुआ और रात में बलेस्सर मंच पर गाने आये तो उन्हें काफी गालियां दी गयीं कि यह बरबाद कर रहा है, इसे अब कभी मंच नहीं देना है. लेकिन जैसे-जैसे सभ्य भोजपुरी समाज उन पर बंदिशें लगाता गया बलेस्सर उसी तेजी से उनके बीच पाॅप्लूयर भी होते गये. बलेस्सर को लोग मंच से बेदखल कर भोजपुरी में अश्लीलता को हटाना चाहते थे. बलेस्सर ने खुद ही इन मंचों से अपने को किनारा कर लिया था. एक समय में मंचों पर छाये रहने वाले बलेस्सर नेपथ्य में चले गये लेकिन रई-रई मार स्टाइल और ओ हो हो हो, आई हो दादा का छौंका मार गीतों को सुनने वालों की तादाद बढ़ती गयी. बलेस्सर संभवतः पहले पाॅप्यूलर भोजपुरी लोक गायक हुए, जिन्हें भोजपुरी भाषी देशों में चाव से सुनने के लिए बार-बार बुलाया जाने लगा था. बलेस्सर पहले गायक हुए, जिन्होंने भोजपुरी भाषी लाखों मजदूरों की सेक्सुअल कंुठा को अपने गीतों के माध्यम से शांत किया. ये वैसे मजदूर थे, जो रोजी-रोटी के चक्कर में दिल्ली, लुधियाना, बंबई आदि स्थानों पर जाते थे और दिन भर की थकान के बाद शाम को जब अपने आवास पर लौटते तो सारी थकान मिटाने, कुंठा को खत्म करने का काम बलेस्सर के गीतों के माध्यम से करते थे. दो साल पहले लखनउ में बलेस्सर से हुई पहली और आखिरी मुलाकात में उन्होंने बड़े प्यार से कुछ बातें समझायी थी. बलेस्सर ने कहा था- मैं आजमगढ़ का रहनेवाला सामान्य सा एक बिरहा गायक हूं. अपनी गायकी को लेकर कभी द्वंद्व में नहीं रहता, ना रहना चाहता हूं कि नवरात्रा आये तो जरा माई का भजन गाकर भी खुद को लोकप्रिय कर लूं, सावन का महीना आये तो जरा बम भोले के गीतों पर भी सुर लगा लूं और जब होली आये तो साया-चोली का बाजूबंद खोलने में लग जाउं. मैं वही गाता हूं, जो सच है. सच यही है कि लोक का मिजाज यथार्थ में जीता है, वह अपने जीवन की सच्चाई को, जीवन की मस्ती को, जीवन की आकांक्षा को लोकगीतों में तलाशता है. हमारे भोजपुरी समाज में एक बड़ा वर्ग कुंठित सेक्स की आकांक्षा के साथ अपने घर-परिवार से अलग रहता है. अगर वैसे लोगों की कुंठा को मेरे गीतों से शांति मिलती है तो समझिये कि मैं वही कर रहा हूं. बलेस्सर ने यह भी कहा था कि मुझे समझ में नहीं आता कि सभ्य समाज मुझे सुधारने में क्यों लगा रहता है. मैं ऐसा ही गायक हूं, यह क्यों नहीं स्वीकार लेते सब. लोगों को परेशानी है तो मेरे गीत ना सुनें और यदि सुधारना है तो उनको भी मारने-पिटने का साहस जुटायें, मंच से बेदखल करने का साहस जुटाये या उन बाल कलाकारों को ही सुधारने की कोशिश करें ंजो अपने गीतों के माध्यम से वे सारे कुकर्म करवाते हैं, जिस पर अश्लील आदमी भी बात करने से बचता है. बलेस्सर का इशारा वैसे गीतों की ओर था, जिसके माध्यम से चोली का हूक लगाने, जिंस को ढिला करने और तमाम तरह का प्रपंच करने में है. बहुत अनुरोध करने के बाद बलेस्सर ने एक गीत का मुखड़ा रई-रई मार स्टाईल के साथ सुनाया था- बुढ़ापे का सहारा लाठी डंडा चाहिए, जवानी में लवंडी को लवंडा चाहिए...
आज फिर बलेस्सर की मृत्यु के बाद सुबह से कई भोजपुरी गायकों, गायिकाओं और लोकसंगीत के कई रसिकों से फोन पर बात की.मैं बलेस्सर के बारे में अधिक से अधिक जानने के खयाल से फोन कर रहा था, जवाब अमूमन सबसे एक-सा ही मिला कि अरे उ कुछ नहीं, मोटका मुंगड़वा जैसा गीत गाकर लोकप्रिय हुए थे, फिर कहां फेंका गये, कोई नहीं जाना. आज फिर बलेस्सर के नाम पर वैसे ही लोग नाक-मुंह सिकोड़ते हुए दिखे, जिन्हें 14-15 सालों के बाल कलाकारों के मंुह से मुरगा-मुरगी का सेक्सुअल गीत सुनना अश्लील नहीं लगता, जिन्हें तनी सा जिंस ढिला कर गीत अश्लील नहीं लगता और न ही जिन्हें यह मिस काॅल मार ताड़ू किस देबू का हो को लेकर कोई आपत्ति है. बलेस्सर के मर जाने के बाद भी बलेस्सर के बारे में दो शब्द अच्छे से बोलने का साहस कथित सभ्य समाज नहीं जुटा पा रहा जबकि एक-डेढ़ साल पहले जब एनडीटीवी इमेजिन पर कल्पना और मालिनी अवस्थी के बीच संगीत का मुकाबला हो रहा था तो कल्पना ने बलेस्सर के गीत-- निक लागे टिकुलिया गोरखपुर के... को गाकर ही दलेर मेंहदी समेत तमाम निर्णायकों को झुमाया था, उस कार्यक्रम को देखनेवाले लोगों को भी अच्छा लगा था बलेस्सर का वह गीत कल्पना की आवाज में. इन सारे लोगों से अच्छा तो वह छोटा सा बच्चा था जो महुआ के सुर संग्राम के रिप्ले कार्यक्रम में आज से कोई दस दिन पहले चैनल पर दिखा था. बलेस्सर स्टाइल में धोती-कुरता पहने. बिरहा गाया- नईहरे में एतना सिंगार तो ससुरा में... मनोज तिवारी ने कुटिल मुस्कान के साथ पूछा उस बच्चे से कि बलेस्सर जी के चेला हउव का हो. उस लड़के ने आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया कि एहू में कोई संदेह हौ का...मनोज तिवारी लगभग निरूत्तर हो गये थे
-11 JANUARY 2011

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